सोमवार, जनवरी 03, 2011

ये भेद फ़कीरी कोई समझ न पायो ??

एक बार की बात है । ख्वाजा हाफ़िज साहब ने कलाम कहा । ब मैं सज्जादह रंगी कुन गरत मुगा गोयद । अगर मुर्शिद कहता है । तो मुसल्ला ( वह कपडा जिस पर बैठकर नमाज पढी जाती है । ) शराब में रंग ले ।  जब यह कलमा ईरान में सुना गया ।  तो तहलका ही मच गया ।  इतने बुजुर्ग हाफ़िज  ने इतने कुफ़्र ( धर्म के खिलाफ़ ) का कलमा कहा । उस समय न्याय का काम काजी लोग करते थे । लोगों ने काजी के पास जाकर शिकायत की । तब बडा काजी ख्वाजा साहब के पास आया । और कहा ।  तुमने कुफ़्र का कलमा कहा है । इसे फ़ौरन वापस लो । या इसका सही मतलब समझाओ ?? ख्वाजा साहब ने कहा । फ़कीर अपना कलाम वापस नहीं लेते । जो मेरे मालिक ने अन्दर से कहा । वही मैंने बाहर से कह दिया । तब काजी बोला । फ़िर इस बात को खोलकर समझाईये ?? हाफ़िज साहब ने उत्तर दिया । काजी । वो सामने पहाड दिखाई दे रहा है । उस पर एक फ़कीर रहता है । वही इस कलाम का मतलब समझायेगा । काजी पहाड पर पहुंचा । और उस फ़कीर से हाफ़िज साहब के कलाम का मतलब बताने को कहा । फ़कीर ने कहा । मतलब मैं तुम्हें फ़िर कभी बताऊंगा ??? लेकिन उस सामने वाले शहर में । फ़लाने मकान में एक वैश्या रहती है । तुम उसके पास जाओ । वह तुम्हें इस सवाल का जवाव देगी । काजी को बडी हैरानी हुयी । कैसे फ़कीर हैं । ये दोनों ? एक कहता है । मुसल्ला  शराब में रंग लो । दूसरा कहता है । वैश्या के घर जाओ ??  उसके मन में हलचल तो मची ही हुयी थी । उसने सोचा कि चलकर असलियत मालूम करनी ही चाहिये ?? यही सब सोचता हुआ । काजी वैश्या का पता पूछकर उसके मकान पर पहुंच गया । वह वैश्या तो उस समय  कहीं गयी हुयी थी । लेकिन उस घर की मुखिया वहां थी । काजी ने वैश्या के  बारे में पूछा । तो उसने कुछ सोचते हुये झूठ बोल दिया । हां है । तुम यहां बैठो अभी बुलाकर लाती हूं ,उसे । उस वैश्या ने बहुत समय से एक लडकी को पाला हुआ था । जो अब जवान हो गयी थी । उस औरत ने लडकी से कहा । देख हम वैश्यायें हैं । और यही हमारा पेशा है । इसलिये  तू बीबी ( जिसकी तलाश में काजी गया था । ) के कपडे पहन ले । बाहर एक ग्राहक आया है । बीबी के न होने से वो लौट जायेगा ।.. लेकिन वह लडकी नेक और पाकदिल थी । उसने सोचा । ये कैसी मुसीवत आ गयी । लेकिन वह बेचारी खरीदकर लाई गयी थी । इसलिये मजबूर थी । उस औरत ने उसे बीबी के कपडे पहना दिये । और जबरदस्ती काजी के पास छोड आयी  । काजी ने उसे देखकर सोचा । ये वैश्या नहीं हो सकती । ये न कुछ बोल रही है । न हंस रही है । न वैश्याओं जैसा व्यवहार कर रही है ।  यह मामला कुछ और ही लगता है । यही सोचते हुये काजी बोला । क्या तुम्ही बीबी हो ? वह लडकी चुपचाप नीचे देखती रही । और कुछ न बोली । काजी ने दोबारा से फ़िर पूछा । लेकिन लडकी पहले की तरह चुप  ही रही ।
आखिरकार काजी बोला । ..बेटी , मैं तुझसे कुछ नहीं कहूंगा । सिर्फ़ इतना बता दे । तू है कौन ??
तब लडकी रोती हुयी बोली । मैं एक मुसीबत की मारी दुखियारी हूं । आज तक मैं पाक साफ़ रही । पर आज इस बुरे नीच रास्ते पर जाने को मजबूर हूं । पता नहीं मेरा क्या होगा । मेरा क्या गुनाह था,जो ..??
काजी ने उसे दिलासा दी । तू डर मत । मैं तुझे कुछ नहीं कहूंगा । सच सच बता । तू कौन  है । और इस दोजख समान घर में किस तरह से आ गयी ?
लडकी ने कहा । मुझे बहुत थोडा थोडा याद है । मैं जब छोटी ही थी ।  । तब हमारे गांव में डाका पडा था । सब लोग भाग गये । मैं भी भागी । पर डाकुओं ने मुझे पकड लिया और इस औरत को बेच गये ।
काजी ने कहा । तुझे याद है । तेरा गांव कौन सा है ?
लडकी ने कहा । मुझे थोडा थोडा याद है । फ़िर उसने गांव का नाम बताया ।
यही काजी का गांव था । काजी हैरान रह गया । अरे ये तो अपने ही गांव की लडकी है । तब उसका उत्साह बड गया । उसने जल्दी से पूछा । तुझे अपने मुहल्ले का नाम याद है , बेटी ?
लडकी ने फ़िर से कहा । मुझे थोडा थोडा याद आता है । शायद ये मुहल्ला था ? उसने नाम बताया ।
 काजी और हैरान हो गया । ये मुहल्ला भी उसका अपना भी था । अपना ही गांव । अपना मुहल्ला । अब तो काजी की उत्सुकता बेहद बड गयी । उसने कहा । बेटी तुझे अपने अब्बा हजूर का नाम याद है ?
लडकी ने कहा । वैसे तो मैं बहुत छोटी थी । पर मुझे कुछ कुछ याद पडता है । कि हमारे अब्बा को बडे लोग इस नाम से बुलाते थे ।
लडकी द्वारा नाम बताते ही मानों विस्फ़ोट हुआ हो.. । काजी का दिल जोर से उछला.. । और मानों गले में आकर अटक गया । मेरी बेटी ..मेरी लाडो..तू आज मिल ही गयी । या अल्लाह  तेरा लाख लाख शुक्र है. ।
बरसों पहले  बिछुडे दोनों बाप बेटी गले लगकर रोने लगे ।
लडकी को वहां से मुक्त कराकर उसे लेकर काजी फ़कीर के पास पहुंचा । उसका सिर शर्म से झुका हुआ था ।
और बोला । दिखावे में तो आपने मुझे दुराचार के लिये भेजा था । परन्तु इसके पीछे भेद कुछ और ही था ।
वो भी कितना बडा भेद था ?? असल में अन्दर से तो आपका मतलब मुझे अपनी बिछुडी हुयी बेटी से मिलाने का था ।
 तब फ़कीर मौज में बोला । अब ख्वाजा साहब से जाकर बोल । इस शेर का अगला मिसरा भी कहें । काजी फ़िर से ख्वाजा साहब के पास गया । और बोला । जनाब । इसका अगला मिसरा भी फ़रमायें ।
इस पर हाफ़िज साहब ने कहा । कि सालिक बेखबर न बवद जे राहो रस्मे मंजिलहा ।
यानी मुर्शिद ही इस भेद का असली जानकार है । फ़कीरों की रमज ( आंतरिक भेद देखने की शक्ति ) को हम मनमुख भला कैसे समझ सकते हैं ।अगर मुर्शिद कोई हुक्म देता है । तो वह ही जिम्मेदार है । क्योंकि वह
नाजायज यानी अनुचित हुक्म कभी नहीं देता । मुर्शिद का जो हुक्म है । तालिब के लिये वही हदीस ( पैगम्बर की कमाई हुयी बात । ) है । वही सब कुछ है ??
ब मैं सज्जादह रंगी कुन गरत मुगा गोयद ।
कि सालिक बेखबर न बवद जे राहो रस्मे मंजिलहा ।

1 टिप्पणी:

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

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