शुक्रवार, जुलाई 16, 2010

हठ योगी

बबलू चालीस साल का हट्टा कट्टा युवक था । और स्वभाव से मिलनसार था । हाँलाकि उससे पहले भी बबलू से मेरी दुआ सलाम थी । लेकिन न तो बबलू जानता था कि मेरी कुन्डलिनी आदि ग्यान में रुचि है । और न ही मैं जानता था कि वो इस दिशा में पिछले सोलह साल से प्रयासरत है । लेकिन एक दिन मेरे एक परिचित यदुनाथ सिंह के साथ जब वो मेरे पास आया तो उस की निगाह एक प्रवचन के कार्यक्रम के दौरान लगाये गये बैनर पर गयी । जिसमें कुन्डलिनी के बारे में लिखा था । उसे भारी जिग्यासा हुयी और वह कुन्डलिनी के वारे में अनेकों प्रश्न करने लगा । मैंने उससे उसकी साधना
के वारे में बात की । कि वह क्या और किस तरह की साधना करता है ? बबलू अपने को " हठ योगी " मानता था । उसकी पत्नी और एक पाँच साल का लङका था । जिसे एक तरह से उसने त्याग रखा था ।यह बबलू का दुर्भाग्य ही था कि ग्यान जिग्यासा के प्रारम्भिक काल में वह बनाबटी बाबाओं के सम्पर्क में आया । और बाद में कोई परिणाम न मिलने पर हताश होकर अपने मन से एक नयी साधना बनाकर उसे हठ साधना कहने लगा । और खुद को " हठ योगी " घोषित कर दिया । मैंने पूछा । क्या है । तुम्हारा
हठ योग ? इस प्रश्न का उत्तर देने में वह बहुत देर तक सोचता रहा । फ़िर बोला । कि मैं अक्सर रात को एक तसले में धूनी आदि लगाकर सभी व्यवस्था करके । मन में हठ धारणा करके एक आसन लगाकर बैठ जाता हूँ । कि प्रभु जैसे तुमने भूतकाल में साधुओं का हठ माना है । मेरा भी मानोगे ?
मैंने मुस्कराते हुये पूछा । कि इस तरह का " हठ " धारण किये हुये तुम्हें कितने साल हो गये ? आठ साल । उसने उत्तर दिया । मैंने कहा । कुछ भी चींटी चींटा जैसा कोई छोटा बङा अनुभव हुआ ? उसने एक आह भरी ।
उसके चेहरे पर घोर निराशा जागी । फ़िर अपने आप को सहज करता हुआ बोला । टाइम लगता है । भाईजी । मैंने कहा । मान लो एक कार खङी हो । और चलने के लिये हर तरह से फ़िट हो । और आप उसके स्टेयरिंग पर बैठकर ये हठ करो । कि ये मेरे बैठने मात्र ही से चल जाय । तो क्या वह चल जायेगी ? आप उसमें चाबी मत लगाओ । उसके अन्य फ़ंक्शन स्टार्ट न करो । तो वह कैसे चलेगी ?
इसके बाद वह हठ योग पर एक लम्बी बहस करने लगा । कैसे अग्यान में जीते है । ये तमाम साधक ? मुझे अस्सी अस्सी साल के ऐसे साधकों से मिलने का अनुभव है । जिन्होंने अपने जीवन के पाँच से लेकर बारह साल तक का बेहद कीमती समय ऐसी ही अग्यानता में नष्ट कर दिया । कोई एक पैर पर खङा रहा । किसी ने हाथ ऊँचा उठा लिया । कोई जल में खङा रहा । कोई तपती धूप और गर्मी में आग के बीच में खुद को तपाता रहा । किसी ने अन्न त्याग दिया । कोई पत्ते ही खाने लगा । किसी ने केश न कटाने का संकल्प कर लिया । किसी ने लिंग की नसें तोङकर उसे निष्क्रिय करवा दिया । कोई वन में चला गया । कोई गुफ़ा में चला गया ..आदि । वास्तव में यह सब शास्त्रों में वर्णित पूर्व श्रेष्ठ उपासकों की एक मनमानी और मनमुखी नकल है । भूतकाल में जिन साधकों ने यह विधियाँ अपनायी थीं । उन्होंने पूर्ण ग्यान का सहारा लिया था । वे मन्त्र आदि उपचार और पूर्णत वैदिक ग्यान परम्परा का अनुसरण करते थे ।
नाकि आजकल के साधकों की तरह एक बात का हठ ले लेते थे । किसी विशेष आसन या मुद्रा में खङे रहना मन की थिरता ( स्थिरता ) के लिये था । शंकर जी और श्रीकृष्ण के भाई बलराम जी ने किसी भी योग साधना के लिये सबसे बङिया " सुखासन " को बताया है । यानी वो आसन जिसमें आप किसी भी प्रकार की तकलीफ़ न महसूस करें । चाहे वो पालती मारकर बैठने की मुद्रा हो या फ़िर शरीर की कोई भी मुद्रा । इसके पीछे वजह ये है । कि यदि आप किसी विशेष आसन से निरंतर कष्ट की अनुभूति करते हैं तो फ़िर साधना में आपका ध्यान नहीं लगेगा । लेकिन सुखासन का ते मतलब भी नहीं है । कि आप इतने सुख में हो कि साधना के स्थान पर आपको नींद आने लगे । हठ योग को कुछ साधु भगवान के प्रति एक पिता और पुत्र जैसा रिश्ता मानकर बालसुलभ हठ की धारणा लेकर चलते हैं । जिसका आशय ये होता है कि जिस प्रकार एक पिता बालक का हठ पूरा करता है । भगवान उनकी भी बात सुनेगा ।
अपनी इस बात को लेकर कालान्तर में हठ योग द्वारा सिद्ध कुछ उदाहरण भी उनके पास मौजूद होते हैं । ये लोग उन उदाहरणों में मौजूद रहस्य को नहीं समझ पाते और अपना जीवन बरबाद कर लेते हैं । वास्तव में इस तरह के जो भी हठ सिद्ध हुये हैं । उनमें अनजाने में एक शुद्ध और निर्मल पवित्र धारणा बन गयी । इस तरह सुरती एकाग्र होकर । आस वास दुबिधा सब खोई । सुरती एक कमल दल होई । वाली क्रिया अनजाने में सहज रूप से हो गयी । और यही करना है । द्रोपदी ने कौन सा हठ कौन सा योग किया था । ग्राह के चन्गुल में फ़ँसे गज ने कौन सा योग किया था । भूतकाल में हुयी सती और पतिवृता स्त्रियों ने कौन सा विशेष योग अपनाया था ? उन्होंने काल की गति तक बदल दी । सूर्य को निकलने से रोक दिया । निश्चित मृत्यु को जीवन में परिवर्तित कर दिया । केवल एक लगन । केवल एक धर्म । इससे अच्छा सरल और सहज योग क्या होगा । बहुत कम लोग जानते होंगे कि गौतम बुद्ध ने भी प्रारम्भ में एक तरह से हठ ही किया था । वन में वृक्ष के नीचे बैठ गये और सोचने लगे कि कैसे प्रभु की प्राप्ति हो । कैसे ग्यान की प्राप्ति हो । बहुत समय बीत गया । हताशा होने लगी । वन के कष्टों ने अत्यन्त व्याकुल कर दिया । तब अंतर्मन से सहज पुकार उठी । कि प्रभु बहुत कष्ट में हूँ । सुख शान्ति का मार्ग कैसे पाऊँ । जो क्रिया सालों में घटित नहीं हुयी । एक क्षण में घटित हो गयी । आकाशवाणी हुयी कि हे साधक अपने शरीर के माध्यम पर ध्यान कर । कोटि जन्म का पंथ था । पल में दिया मिलाय । क्या साधना से घटित हुआ । नहीं एकाग्र प्रार्थना से संभव हुआ । यही एकाग्र प्रार्थना सालों पहले कर लेते तो भी यही क्रिया घटित होती । पर तब " कर्तापन " का हठ था । ये उसी तरह है कि दो लोग कार की सवारी का आनन्द लेना चाहे । तो एक बैठे और दूसरा धक्का मारकर उसको गति दे । फ़िर सवार धक्का दे और धक्का मारने वाला सवारी करे । इसके बजाय आप तरीका जानते हैं तो आराम से सीट पर बैठे चाबी लगाकर स्टार्ट करें और आराम से सफ़र करें । क्या करना है । मैं मारना है । कर्तापन मारना है । अहम बाधक है । यही एकाग्र नहीं होने देता । यही नहीं मिलने देता । गौर करें ।
सुरति फ़ँसी संसार में तासो हुय गयो दूर । सुरति मान थिर करो आठों पहर हजूर ।
जब मैं था तब हरि नहीं । जब हरि हैं मैं नाहिं । सब अंधियारा मिट गया जब दीपक देख्या मांहि ।
प्रेम गली अति सांकरी । जामें दो न समाय । शीश उतार भूमि धरो तब पैठो घर माहिं ।
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा ।

1 टिप्पणी:

Rajeev ने कहा…

जय गुरूदेव की

राजीव जी हठ योग के बारे में समझ आ गया,और मेरी रूचि भी ना तो हठ योग में है,ना ही कुन्डलनी में,मेरी रूचि तो प्रभु की कृपा पाने में है,और यह भी मानता हूँ,प्रभु एक हैं,फिर भी अम्बे माँ की ओर विशेष झुकाव है,और इसका उत्तर आपने दे भी दिया था ।
आभार ।

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