गुरुवार, दिसंबर 30, 2010

द्रौपदी

जब Pandav तथा कौरव राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण हो गई । तो उन्होंने द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा देना चाहा । Dronachary को द्रुपद के द्वारा किये गये अपने insult का स्मरण हो आया । और उन्होंने कहा । राजकुमारों । यदि तुम गुरुदक्षिणा देना चाहते हो । तो पाञ्चाल नरेश Drupad को बन्दी बनाकर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो । यही तुम लोगों की गुरुदक्षिणा होगी । गुरुदेव के इस प्रकार कहने पर समस्त राजकुमार अपने अपने अस्त्र शस्त्र लेकर पाञ्चाल देश की ओर चले ।
पाञ्चाल पहुँचने पर Arjun ने कहा । Gurudev । आप पहले कौरवों को द्रुपद से युद्ध करने की आज्ञा दीजिये । यदि वे द्रुपद को बन्दी बनाने में असफल रहे । तो हम पाण्डव युद्ध करेंगे । Guru की आज्ञा मिलने पर दुर्योधन के नेतृत्व में कौरवों ने पाञ्चाल पर आक्रमण कर दिया । दोनों पक्षों के मध्य भयंकर युद्ध होने लगा । किन्तु अन्त में kourav परास्त होकर भाग निकले । कौरवों को पलायन करते देख पाण्डवों ने आक्रमण कर दिया । भीम तथा अर्जुन के पराक्रम के समक्ष द्रुपद की सेना हार गई । अर्जुन ने द्रुपद को बन्दी बना लिया । और द्रोणाचार्य के समक्ष ले आये ।
द्रुपद को बन्दी देखकर द्रोणाचार्य ने कहा । द्रुपद । अब तुम्हारे राज्य का स्वामी मैं हो गया । मैं तो तुम्हें अपना मित्र समझकर तुम्हारे पास आया था । किन्तु तुमने मुझे अपना मित्र स्वीकार नहीं किया था । अब बताओ क्या तुम मेरी मित्रता स्वीकार करते हो ? द्रुपद ने लज्जा से सिर झुका लिया । और क्षमायाचना करते हुये बोले । द्रोण । आपको मित्र न मानना मेरी भूल थी । और उसके लिये अब मेरे हृदय में पश्चाताप है । मैं तथा मेरा राज्य दोनों अब आपके आधीन हैं । अब आपकी जो इच्छा हो करें । द्रोणाचार्य ने कहा । तुमने कहा था । कि मित्रता समान वर्ग के लोगों में होती है । अतः मैं तुमसे बराबरी का मित्र भाव रखने के लिये । तुम्हें तुम्हारा आधा राज्य लौटा रहा हूँ । इतना कहकर द्रोणाचार्य ने ganga के दक्षिणी तट का राज्य द्रुपद को सौंप दिया । और शेष को स्वयं रख लिया ।
द्रोण से पराजित होने के उपरान्त द्रुपद अत्यन्त लज्जित हुये । और उन्हें नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे । इसी चिन्ता में वे घूमते हुये कल्याणी नगरी के ब्राह्मण बस्ती में जा पहुँचे । वहाँ उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकाण्डी ब्राह्मण भाइयों से हुई । द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया । एवं उनसे द्रोणाचार्य के मारने का उपाय पूछा । तब बड़े भाई याज ने कहा । इसके लिये आप 1 विशाल यज्ञ करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिये । जिससे वे आपको वे महान बलशाली पुत्र का वरदान देंगे । महाराज ने याज और उपयाज से कहे अनुसार यज्ञ करवाया । प्रसन्न होकर अग्निदेव ने उन्हें 1 ऐसा पुत्र दिया । जो सम्पूर्ण आयुध एवं कवच कुण्डल से युक्त था । उसके पश्चात् उस यज्ञकुण्ड से 1 कन्या उत्पन्न हुई । जिसके नेत्र खिले हुये कमल के समान देदीप्यमान थे । भौहें चन्द्रमा के समान वक्र थीं । तथा उसका वर्ण श्यामल था । उसके उत्पन्न होते ही 1 आकाशवाणी हुई । कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के सँहार और कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है । बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया ।
पाण्डवों को एकचक्रा नगरी में रहते कुछ time व्यतीत हो गया । तो 1 दिन भ्रमण करता हुआ 1 ब्राह्मण आया । पाण्डवों ने पूछा । देव । आपका आगमन कहाँ से हो रहा है ? ब्राह्मण ने उत्तर दिया । मैं महाराज द्रुपद की नगरी । पाञ्चाल से आ रहा हूँ । वहाँ पर द्रुपद की कन्या द्रौपदी के स्वयंवर के लिये । अनेक देशों के राजा महाराजा पधारे हुये हैं ।
उस ब्राह्मण के प्रस्थान करने के पश्चात । पाण्डवों से भेंट करने वेदव्यास आ पहुँचे । Vyas ने पाण्डवों को आदेश दिया । कि तुम लोग पाञ्चाल जाओ । वहाँ द्रुपद कन्या पाञ्चाली का स्वयंवर होने जा रहा है । वह कन्या तुम लोगों के सर्वथा योग्य है । क्योंकि पूर्वजन्म में उसने शंकर की तपस्या की थी । और उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर । Shiv ने उसे अगले जन्म में 5 उत्तम पति प्राप्त होने का वरदान दिया था । वह देविस्वरूपा बालिका सब भाँति से तुम लोगों के योग्य ही है । तुम लोग वहाँ जाकर उसे प्राप्त करो । इतना कहकर व्यास वहाँ से चले गये ।
स्वयंवर में अनेक देशों के राजा महाराजा एवं राजकुमार पधारे हुये थे । 1 ओर श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम तथा यदुवंशियों के साथ विराजमान थे । वहाँ वे ब्राह्मणों की पंक्ति में जाकर बैठ गये । कुछ ही देर में द्रौपदी हाथ में वरमाला लिये अपने भाई धृष्टद्युम्न के साथ उस सभा में पहुँचीं । धृष्टद्युम्न ने सभा को सम्बोधित करते हुये कहा । हे राजा महाराजा एवं अन्य गणमान्य जन । इस मण्डप के ऊपर बने उस घूमते हुये यंत्र पर ध्यान दीजिये । उस यन्त्र में 1 fish यंत्र के साथ घूम रही है । आपको स्तम्भ के नीचे रखे तैलपात्र में मछली के प्रतिबिम्ब को देखते हुये बाण चलाकर मछली की आँख को निशाना बनाना है । सफल निशाना लगाने वाले से द्रौपदी का विवाह होगा ।
1 के बाद 1 सभी ने fish पर निशाना साधने का प्रयास किया । किन्तु सफलता हाथ न लगी । और वे लज्जित होकर अपने स्थान में लौट आये । इन असफल लोगों में जरासंध । शल्य । शिशुपाल तथा दुर्योधन । दुशासन आदि कौरव भी सम्मिलित थे । कौरवों के असफल होने पर कर्ण ने मछली को निशाना बनाने के लिये धनुष उठाया । किन्तु द्रौपदी बोल उठीं । यह सूतपुत्र है । इसलिये मैं इसका वरण नहीं कर सकती । कर्ण ने लज्जित होकर धनुष बाण रख दिया । उसके पश्चात् अर्जुन ने निशाना लगाने के लिये धनुष उठा लिया । 1 ब्राह्मण को राजकुमारी के स्वयंवर के लिये उद्यत देख वहाँ उपस्थित जनों को अत्यन्त आश्चर्य हुआ । किन्तु ब्राह्मणों के क्षत्रियों से अधिक श्रेष्ठ होने के कारण से उन्हें कोई रोक न सका । अर्जुन ने तैलपात्र में मछली के प्रतिबिम्ब को देखते हुये । 1 ही बाण से मछली की आँख को भेद दिया । द्रौपदी ने आगे बढ़कर अर्जुन के गले में वरमाला डाल दिया । 1 ब्राह्मण के गले में द्रौपदी को वरमाला डालते देख समस्त क्षत्रिय राजा महाराजा एवं राजकुमारों ने क्रोधित होकर अर्जुन पर आक्रमण कर दिया । अर्जुन की सहायता के लिये शेष पाण्डव भी आ गये । और पाण्डवों तथा क्षत्रिय राजाओं में घमासान युद्ध होने लगा । श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पहले ही पहचान लिया था । इसलिये उन्होंने बीचबचाव करके युद्ध शान्त करा दिया । दुर्योधन ने भी अनुमान लगा लिया । कि निशाना लगाने वाला अर्जुन ही रहा होगा । और उसका साथ देने वाले शेष पाण्डव रहे होंगे । वारणावत के लाक्षागृह से पाण्डवों के बच निकलने पर उसे अत्यन्त आश्चर्य होने लगा । पाण्डव द्रौपदी को साथ लेकर वहाँ पहुँचे । जहाँ वे mother कुन्ती के साथ निवास कर रहे थे । द्वार से ही अर्जुन ने अपनी माता से कहा । mother । आज हम आपके लिये 1 अद्भुत भिक्षा लेकर आये हैं । उस पर कुन्ती ने भीतर से ही कहा । पुत्रों । तुम लोग आपस में मिलबाँट उसका उपभोग कर लो । बाद में यह ज्ञात होने पर । कि भिक्षा bride के रूप में हैं । कुन्ती को अत्यन्त पश्चाताप हुआ । किन्तु mother के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिये । कुन्ती ने 5 पाण्डवों को पति के रूप में स्वीकार कर लिया ।
पाण्डवों के द्रौपदी को साथ लेकर अपने निवास पर पहुँचने के कुछ time पश्चात उनके पीछे पीछे कृष्ण भी वहाँ पर आ पहुँचे । कृष्ण ने अपनी बुआ कुन्ती के चरणस्पर्श किये । और पाण्डवों से गले मिले । तब युधिष्ठिर ने कृष्ण से पूछा । द्वारिकाधीश । आपने इस अज्ञातवास में हमें पहचान कैसे लिया ? कृष्ण ने उत्तर दिया । भीम और अर्जुन के पराक्रम को देखने के पश्चात । भला मैं आप लोगों को कैसे न पहचानता । सभी से मुलाकात करके कृष्ण वहाँ से द्वारिका चले गये । फिर पाँचों भाइयों ने भिक्षावृति से भोजन सामग्री एकत्रित किया । और उसे लाकर माता kunti के सामने रख दिया । कुन्ती ने द्रौपदी से कहा । देवि । इस भिक्षा से पहले देवताओं के अंश निकालो । फिर ब्राह्मणों को भिक्षा दो । तत्पश्चात आश्रितों का अंश अलग करो । उसके बाद जो शेष बचे । उसका आधा भाग भीम को । और शेष आधा भाग हम सभी को भोजन के लिये परोसो । Dropadi ने कुन्ती के order का पालन किया । भोजन के पश्चात कुशासन पर मृगचर्म बिछाकर वे सो गये । द्रौपदी mother kunti के पैरों की ओर सोई ।
द्रौपदी के स्वयंवर के समय दुर्योधन के साथ ही साथ द्रुपद । धृष्तद्युम्न एवं अनेक अन्य लोगों को संदेह हो गया था । कि वे ब्राह्मण Pandav ही हैं । उनकी परीक्षा के लिये द्रुपद ने धृष्टद्युम्न को भेजकर उन्हें अपने राजप्रासाद में बुलवा लिया । राजप्रासाद में द्रुपद एवं धृष्टद्युम्न ने पहले राजकोष को दिखाया । किन्तु पाण्डवों ने वहाँ रखे रत्नाभूषणों तथा रत्न माणिक्य आदि में किसी प्रकार की रुचि नहीं दिखाई । किन्तु जब वे शस्त्रागार में गये । तो वहाँ रखे अस्त्र शस्त्रों उन सभी ने बहुत अधिक रुचि प्रदर्शित किया । और अपनी पसंद के शस्त्रों को अपने पास रख लिया । उनके क्रियाकलाप से द्रुपद को विश्वास हो गया । कि ये ब्राह्मण के रूप में योद्धा ही हैं । द्रुपद ने युधिष्ठिर से पूछा । आर्य । आपके पराक्रम को देखकर मुझे विश्वास हो गया है । कि आप लोग ब्राह्मण नहीं हैं । कृपा करके आप अपना सही परिचय दीजिये । उनके वचनों को सुनकर युधिष्ठिर ने कहा । राजन । आपका कथन सत्य है । हम पाण्डु पुत्र पाण्डव हैं । मैं युधिष्ठिर हूँ । और ये भीमसेन । अर्जुन । नकुल एवं सहदेव हैं । हमारी माता कुन्ती आपकी पुत्री द्रौपदी के साथ आपके महल में हैं । युधिष्ठिर की बात सुनकर द्रुपद अत्यन्त प्रसन्न हुये । और बोले । आज god ने मेरी सुन ली । मैं चाहता था कि मेरी Daughter का विवाह पाण्डु के पराक्रमी पुत्र Arjun के साथ ही हो । मैं आज ही अर्जुन और द्रौपदी के विधिवत विवाह का प्रबन्ध करता हूँ । इस पर युधिष्ठिर ने कहा । राजन । द्रौपदी का विवाह तो हम 5 भाइयों के साथ होना है । यह सुनकर द्रुपद आश्चर्यचकित हो गये । और बोले । यह कैसे सम्भव है ? 1 पुरुष की अनेक पत्नियाँ अवश्य हो सकती हैं । किन्तु 1 स्त्री के 5 पति हों ऐसा न कभी देखा गया और न सुना गया । युधिष्ठिर ने कहा । राजन । न तो मैं कभी मिथ्या भाषण करता हूँ । और न ही कोई कार्य धर्म या शास्त्र विरुद्ध करता हूँ । हमारी mother ने हम सभी भाइयों को द्रौपदी का उपभोग करने का आदेश दिया है । और मैं माता की आज्ञा की अवहेलना कदापि नहीं कर सकता । इसी समय वहाँ पर व्यास पधारे । और उन्होंने द्रुपद को द्रौपदी के पूर्वजन्म में तपस्या से प्रसन्न होकर Shankar के द्वारा 5 पराक्रमी पति प्राप्त करने के वर देने की बात बताई । व्यास के वचनों को सुनकर द्रुपद का सन्देह समाप्त हो गया । और उन्होंने अपनी पुत्री द्रौपदी का पाणिग्रहण संस्कार पाँचों पाण्डवों के साथ धूमधाम के साथ कर दिया । इस विवाह में विशेष बात यह हुई कि नारद ने स्वयं पधार कर द्रौपदी को प्रतिदिन कन्यारूप हो जाने का आशीर्वाद दिया ।
पाण्डवों के जीवित होने । तथा द्रौपदी के साथ विवाह होने की बात तेजी से सभी ओर फैल गई । हस्तिनापुर में इस समाचार के मिलने पर । दुर्योधन और उसके सहयोगियों के दुख का पारावार न रहा । वे पाण्डवों को उनका राज्य लौटाना नहीं चाहते थे । किन्तु भीष्म । विदुर । द्रोण आदि के द्वारा धृतराष्ट्र को समझाने तथा दबाव डालने के कारण उन्हें पाण्डवों को राज्य का आधा हिस्सा देने के लिये विवश होना पड़ गया । विदुर पाण्डवों को बुला लाये । धृतराष्ट्र । द्रोणाचार्य । कृपाचार्य । विकर्ण । चित्रसेन आदि सभी ने उनकी अगवानी की । और राज्य का खाण्डव वन नामक हिस्सा उन्हें दे दिया गया । पाण्डवों ने उस खाण्डव वन में 1 नगरी की स्थापना करके उसका नाम इन्द्रप्रस्थ रखा । तथा इन्द्रप्रस्थ को राजधानी बनाकर राज्य करने लगे । युधिष्ठिर की लोकप्रियता के कारण कौरवों के राज्य के अधिकांश प्रजाजन पाण्डवों के राज्य में आकर बस गये ।

गुरुवार, सितंबर 23, 2010

प्रभु । आप ठीक ही कहते थे ?


एक बार नारद को लगा कि विष्णु इंसानों के बारे में कुछ नहीं सोचते । इंसान बेचारा भक्ति करता हुआ कष्ट से मरा जा रहा है । और भगवान यहां अपने लोक में मौज कर रहे हैं । उन्हें भला इंसानों की क्या परवाह है ? यह प्रश्न ध्यान में आते ही नारद नारायण नारायण करते हुये क्षीरसागर पहुंच गये । विष्णु ने उनका स्वागतम किया । कुछ देर बाद नारद ने अपनी बात विष्णु से कही । प्रभु । मैं देखता हूं । कि प्रथ्वी पर लोग कितने कष्ट में हैं । सारे जीव त्राहि त्राहि कर रहे हैं । और आप इन सब बातों से बेपरवाह यहां स्वर्ग का आनन्द ले रहे हैं । मुझे तो यह अन्याय लगता है । प्रभु । विष्णु ने कहा । नारद जी आपकी आधी बात ही सत्य है । मैं तो चाहता हूं कि सभी जीव यहां आ जांय । और आनन्द से रहें । पर जीव अपने मजे में मृत्युलोक में ही ऐसा मस्त है । कि यहां कोई आना ही नहीं चाहता ? नारद को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ । कि जीव भला स्वर्ग के मजे को छोडकर मृत्युलोक में क्यो पडा रहेगा ? विष्णु उनके मन की बात समझकर बोले । नारद जी ठीक है । इस बात को आजमाकर देखो । जाओ । और प्रथ्वी से बुरी से बुरी स्थिति वाला जीव । और कोई बेहद सुखी इंसान लेकर आओ । मैं उन्हें स्वर्ग में भेज दूंगा । नारद जी को यह बात उचित लगी । और वे परीक्षण हेतु दो ऐसे जीवों की तलाश में प्रथ्वी पर आये । जिनमें एक बेहद बुरी स्थिति में हो । और दूसरा सब प्रकार से सुखी सम्पन्न हो । उन्होंने सोचा । बुरी स्थिति वाला जीव जल्दी जायेगा । अतः उन्होंने सबसे बुरी स्थिति वाले जीव की तलाश की । तो उन्हें एक सुअर मिला । उन्होंने सोचा । इससे दयनीय हालत में कोई नहीं है । उन्होंने कहा । मैं स्वर्ग से आया हूं । और तुम्हें वहां ले जा सकता हूं । क्या तुम स्वर्ग चलना पसंद करोगे ? सुअर बहुत खुश हुआ । और बोला । इससे अच्छी बात भला क्या हो सकती है । नारद भी बहुत खुश हुये । कि देखो । मेरा अन्दाजा सही था । विष्णु गलत सोचते हैं । वे दोनों चलने को तैयार हो गये । कि तभी अचानक सुअर को कुछ ध्यान आया । और वह बोला । एक बात तो मैं पूछना ही भूल गया । कृपया वह भी बता दें । स्वर्ग में मेरी मनपसन्द विष्ठा खाने को मिलेगी ? मल खाने को मिलेगा या नहीं ? नारद अचकचाकर बोले । पागल हो गये हो तुम । स्वर्ग में भला विष्ठा का क्या काम । सुअर तुरन्त बोला । फ़िर स्वर्ग जाने से क्या फ़ायदा ? नारद निराश हो गये । बुरी स्थिति वाला सुअर । बुरी स्थिति में खुश था । उसे इसी में मजा आता था । नारद ने सोचा । अब दूसरा परीक्षण भी करना चाहिये । तब वे सब भांति सम्पन्न । सभी तरह के सुख भोग चुके । एक नाती पोतों वाले वृद्ध के पास पहुंचे । और बोले । महानुभाव । मैं आपको स्वर्ग ले जा सकता हूं । क्या आप स्वर्ग जाना पसन्द करोगे ? वह वृद्ध बोला । हां हां । क्यों नहीं । इससे अच्छी बात भला क्या हो सकती है । लेकिन बस आप चार महीने बाद आना । क्योंकि मेरी छोटी पुत्रवधू के संतान होने वाली है । मैं चाहता हूं । जीते जी उसका मुख ही देख लूं । कोई बात नहीं । कहकर नारद वापस चले गये । और फ़िर लगभग एक साल बाद आये । और बोले । महानुभाव । अब क्या आप स्वर्ग जाने हेतु तैयार हो ? वृद्ध बोला । हां हां । बिलकुल । लेकिन । कृपया मुझे एक साल की मोहलत और दें । because ये मेरा नवजात नाती बडा प्यारा है । और मैं कुछ समय इसको खिलाते हुये आनन्द लेना चाहता हूं । कोई बात नहीं । कहकर नारद फ़िर वापस चले गये । इसके बाद चार साल बाद पहुंचे । तो वह वृद्ध कहीं दिखायी नहीं दिये । घरवालों ने पूछने पर बताया । कि वो तो स्वर्गवासी हो गये । अर्थात मर गये । नारद ने सोचा । कि स्वर्ग का तो मेरा आना जाना होता ही रहता है । मुझे तो कहीं नजर नहीं आये । तब उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखा । तो बाबाजी कुत्ता योनि में वहीं घर के आगे पूंछ हिलाते हुये रोटी के टुकडे की आस में खडे थे । नारद जी को बडी हैरत हुयी । स्वर्ग नहीं गये । और कुत्ता बने यहां पूंछ हिला रहे हैं । खैर । अभी नारद जी कुछ कहते । इससे पहले ही घर से उनकी एक बहू निकलकर आयी । और उसने झुंझलाकर । यह कहते हुये । कुत्ते को एक जोर का डन्डा मारा । ये कुत्ता । कमबख्त । यहीं मंडराता रहता है । नारद जी । ने उनसे मानसिक सम्बन्ध जोडा । और बोले । अब तो चलो । बहू के हाथ से पिटते हो । तब वह कुत्ता झेंपता हुआ बोला । कोई बात नहीं । मारने वाले अपने ही हैं । नारद ने कहा । खैर । अब तो चलोगे । कुत्ता बोला । अरे नारद जी । अभी कैसे जा सकता हूं । कितने जतन से जीवन भर सम्पत्ति जोडी । और ये मेरी औलाद । इसकी ठीक से देखरेख नहीं कर सकती । ये सब डाकू लूट ले जायेंगे । अतः मैं भली प्रकार इसकी देखरेख करता हूं । नारद जी ने झुंझलाकर माथे पर हाथ मारा । और बोले । प्रभु । आप ठीक ही कहते थे ?

बुधवार, अगस्त 18, 2010

बलासुर के शरीर के सभी अंग ही रत्न बीज के रूप में परिणित हो गये ।


प्राचीनकाल में बल नाम का एक राक्षस था । इसने इन्द्र आदि सभी देवों को पराजित कर दिया था । कोई भी देवता इसको जीतने में समर्थ नहीं था । अतः देवताओं ने उपाय हेतु एक यग्य करने का विचार किया ।और उस असुर के पास जाकर उससे यग्य पशु बनने की प्रार्थना की । वचनबद्ध बलासुर ने अपना शरीर
देवताओं को दान में दे दिया । और अपने ही वाग्वज्र से वह पशुवत ही मारा गया । उस असुर ने संसार के कल्याण हेतु । देवताओं की हितकामना से यग्य में शरीर का त्याग किया था । अतः उसका शरीर विशुद्ध सत्वगुण सम्पन्न हो गया । उसके शरीर के सभी अंग रत्न बीज के रूप में परिणित हो गये । इस प्रकार रत्नों की उत्पत्ति होने पर । देवता । यक्ष । नाग तथा सिद्धों का बडा ही उपकार हुआ । जब वे विमान से उसके शरीर को आकाशमार्ग से ले जा रहे थे । तो वेग के कारण उसका शरीर स्वतः ही खण्ड खण्ड होकर प्रथ्वी पर जहां तहां गिरने लगा । उसके शरीर के अंग प्रथ्वी पर समुद्र । नदी । पर्वत । वन आदि जहां कहीं भी गिरे । उन स्थानों पर रत्न की खान बन गयी और वह स्थान उसी रत्न के नाम से प्रसिद्ध हो गया । उन खानों में विविध प्रकार के और रत्न उत्पन्न होने लगे । जो राक्षस । विष । सर्प । व्याधि आदि पाप जनित रोगों को दूर करने में समर्थ थे । रत्नों के अलग अलग प्रकारों को । वज्र या हीरा । मुक्तामणि । पद्मराग । मरकत । इन्द्रनील । वैदूर्य । पुष्पराग । कर्केतन । पुलक । रुधिर । स्फ़टिक । प्रवाल आदि कहते हैं ।
रत्न पारखी और रत्न के चाहने वालों को सर्वप्रथम । रत्न का आकार । रंग । गुण । दोष । फ़ल । परीक्षा तथा मूल्य ग्यात होना चाहिये । क्योंकि कुत्सित लग्न और कुयोग से बाधित । अशुभ दिन में जिन रत्नों की उत्पत्ति होती है । वे दोष युक्त हो जाते हैं । और उनकी गुण क्षमता निश्चय ही नष्ट हो जाती है ।
रत्नों में वज्र यानी हीरा सर्वाधिक प्रभावशाली होता है । वज्र यानी हीरे की उत्पत्ति बलासुर के अस्थिभाग से हुयी । हिमांच्चल । मातंग । सौराष्ट्र । पौण्ड्र । कलिंग । कोसल । वेण्वातट । सौवीर ये प्रथ्वी पर आठ भूभाग हीरा के क्षेत्र हैं । हिमालय से उत्पन्न हीरा तांबे के रंग का । वेणुका तट से प्राप्त हीरा चन्द्रमा जैसा सफ़ेद । सौवीर का नीलकमल और कृष्णमेघ के समान । सौराष्ट्र का तांबे के रंग का । कलिंग देश का सोने के समान । कोसल का पीले रंग का । पौण्ड्र का काला । मतंग का हल्के पीले रंग का होता है ।
संसार में कहीं पर अत्यन्त क्षुद्र वर्ण । पार्श्व भाग में भली प्रकार से दिखाई देने वाली रेखा । बिंदु । कालिमा । त्रास आदि दोष से रहित । परमाणु की तरह बहुत छोटा तथा बह्द तीखी धार वाला दुर्लभ हीरा मिल जाय । तो उसमें देवता का वास समझा जाता है । रंगो के अनुसार ही हीरों में देवताओं का विग्रह माना गया है । सफ़ेद । हरे । पीले । पिंगल । कालेपन पर । तथा तांवे के रंग के हीरे सुन्दर माने गये है । जस प्रकार संसार में वर्ण संकरता यानी नीच ऊंच भाव दुखदायी एवं दोषयुक्त होता है । हीरे का वर्णसंकर उससे कहीं अधिक कष्टकारक होता है । इसीलिये रंग और सुन्दरता के आधार पर ही हीरा रखना उचित नहीं होता । गुणवान रत्न गुण और सम्पत्ति लाता है । गुणहीन रत्न कष्ट लाता है । हीरे का एक भी हिस्सा टूटा या छिन्न भिन्न हो तो ऐसे गुणवान हीरे को घर में रखना उचित नहीं होता । अग्नि के समान स्फ़ुटित । श्रंगभाग से युक्त । विशीर्ण । गंदे या धुंधले रंग वाले । बीच स्थान में बिंदुओं वाले हीरे को पास में रखने से तुरन्त धन का नाश होने लगता है । जिस हीरे का कोई हिस्सा किसी चीज से विदीर्ण और क्षत विक्षत तथा मनुष्य शरीर जैसी आभा दिखाता हो । और खून के फ़ैले होने जैसा आभास देता हो । ऐसा हीरा
रखने से अत्यन्त शक्तिशाली व्यक्ति की भी मृत्यु हो जाती है । षटकोण । विशुद्ध । निर्मल । तीखे धार वाला । छोटा । सुन्दर और पार्श्वभाग से युक्त तथा मनोहारी किरणें सी बिखेरता हुआ हीरा बेहद दुर्लभ होता है ।
जो मनुष्य दोषशून्य । तीखे किनारे वाला । निर्मल हीरा पहनता है । वह जीवन भर स्त्री सम्पत्ति पुत्र धन धान्य आदि से भरा पूरा रहता है । सर्प । जहर । व्याधिया । अग्नि । जल । चोर आदि का भय । मन्त्र तन्त्र द्वारा अहित के लिये की गयी क्रियायें । ऐसे हीरे के पास आने से पहले ही दूर से निकल जाते हैं । यदि हीरा सभी दोषों से रहित और वजन में बीस तण्डुल ( आठ गौर सरसों के दानों के भार के बराबर एक तण्डुल होता है ) का हो । तो उसका मूल्य अन्य हीरों की तुलना में दोगुना होता है । जो हीरा सब गुणों से युक्त होता है । और जल में डालने पर तैरता है । वह सर्वश्रेष्ठ होता है । उसको धारण करना अति उचित है । जिस हीरे में थोडा भी दोष हो । उसकी कीमत सिर्फ़ असली कीमत की दस परसेंट रह जाती है । जिस हीरे में छोटे बडे कई दोष हों उसकी कीमत मूल कीमत की एक परसेंट ही रह जाती है । प्रथ्वी में जितने भी रत्न या लोहा आदि जितनी भी धातुएं हैं । हीरा उन सबमें चिह्नांकन कर सकता है । किन्तु अन्य कोई भी रत्न या धातु हीरे में चिह्नांकन नहीं कर सकती । पुष्परागादि जातिविशेष के रत्न दूसरी जाति के रत्न को काट सकते है । किन्तु हीरा और माणिक या कु्रुबिल्ब अपनी ही जाति के रत्न को काटने में सक्षम होते हैं । हीरे से ही हीरे को काट सकते हैं । अन्य रत्नों से हीरे को नहीं काट सकते । हीरे के अलावा । हीरक और मुक्ता आदि जितने भी रत्न हैं । उनमें किसी की भी प्रभा ऊपर की ओर नहीं जाती । केवल हीरा ही ऐसा
होता है । जिसकी प्रभा ऊपर की ओर जाती है ।

सोमवार, अगस्त 16, 2010

गंगा अवतरण ।




हिमालय और उसकी पत्नी सुमेरु पर्वत की पुत्री मैना की अत्यंत सुन्दर रूपवती और बेहद गु्णवान दो कन्याएँ थीं । । जिनमें बड़ी का नाम गंगा तथा छोटी का उमा था । गंगा अत्यन्त सुन्दर और असाधारण गुणों की मालकिन थी । वह उन्मुक्त रहकर मनमाने मार्ग पर चलती थी । उसकी इसी बात से प्रभावित होकर देवता उसे हिमालय से माँग कर ले गये । दूसरी कन्या उमा तपस्विनी थी । उसने कठोर तपस्या कर शिव को वर के रूप में प्राप्त किया । देवलोक में विचरती हुई गंगा की एक दिन उमा से भेंट हुई । गंगा ने उमा से कहा । मुझे देवलोक में रहते हुये बहुत दिन हो गये । मेरी इच्छा है कि मैं अब पृथ्वी पर विचरण करूँ । उमा ने उससे कहा । कि वह इसके लिये कोई उपाय करने की कोशिश करेंगी । उन्हीं दिनों अयोध्यापुरी में सगर नाम के एक राजा थे । उनके कोई संतान नहीं थी । सगर की रानी का नाम केशिनी था । जो विदर्भ के राजा की पुत्री थी । केशिनी बेहद सुन्दर और धर्मात्मा थी । सगर की दूसरी रानी का नाम सुमति था । वह राजा अरिष्टनेमि की पुत्री थी । सगर अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय के भृगुप्रस्रवण नामक प्रान्त में गए । और पुत्र प्राप्ति के लिये तप करने लगे । उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उन्हें वर दिया । कि तुम्हें अनेक पुत्रों की प्राप्ति होगी । दोनों रानियों में एक को केवल एक पुत्र होगा । जो वंश को बढ़ायेगा । और दूसरी के साठ हजार पुत्र होंगे । कौन सी रानी कितने पुत्र चाहती है । इसका निर्णय वह स्वयं करे । केशिनी ने वंश को बढ़ाने वाले एक पुत्र की कामना की । और गरुड़ की बहिन सुमति ने साठ हजार बलवान पुत्रों की इच्छा की । कुछ समय के बाद केशिनी ने असमञ्ज नामक पुत्र को जन्म दिया । और सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकला । जिसे फ़ाड़ने पर छोटे छोटे साठ हजार पुत्र निकले । उन सबका पालन घी के घड़ों में रखकर किया गया । समय बीतने के साथ सभी राजकुमार युवा हो गये । सगर का बडा पुत्र असमञ्ज अति दुराचारी स्वभाव का था । उसे नगर के बालकों को सरयू नदी में फेंककर उन्हें डूबते हुये देखने में बड़ा आनन्द आता था । असमञ्ज की आदतों से दुखी होकर सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया । असमञ्ज के अंशुमान नाम का एक पुत्र था । पिता के स्वभाव के विपरीत अंशुमान सदाचारी और पराक्रमी था । एक दिन सगर के मन में अश्वमेघ यज्ञ करने का विचार आया । तब सगर ने हिमालय एवं विन्ध्याचल के बीच उत्तम भूमि का चयन कर एक विशाल यज्ञ मण्डप का निर्माण कराया । और अश्वमेघ यज्ञ के लिये घोड़ा छोड़कर उसकी रक्षा के लिये अंशुमान को सेना के साथ भेज दिया । यज्ञ की सफलता से भयभीत होकर इन्द्र ने राक्षस का रूप धारणकर घोड़े को चुरा लिया । घोड़े की चोरी की सूचना पाकर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आज्ञा दी । कि घोड़ा चुराने वाले को पकड़कर या मारकर घोड़ा वापस लाओ । लेकिन जब हर तरफ़ खोजने पर भी घोड़ा नहीं मिला तो । तो यह सोचकर कि किसी ने घोडा चुराकर तहखाने में न छुपा दिया हो । उन्होंने पृथ्वी को खोदना आरम्भ कर दिया । इस कार्य से लाखों भूमिगत प्राणी मारे गये । लेकिन इसकी चिंता न कर खोदते खोदते वे पाताल तक पहुँच गये । तब देवताओं ने ब्रह्मा से चिंता प्रकट की । ब्रह्मा ने कहा । ये राजकुमार क्रोध में अन्धे होकर ऐसा कार्य कर रहे हैं । लेकिन पृथ्वी की रक्षा की जिम्मेदारी कपिल ऋषि पर है । इसलिये वे इस विषय में अवश्य कुछ करेंगे । उधर पूरी पृथ्वी को खोदने के बाद भी जब घोड़ा और उसको चुराने वाला नहीं मिला । तो निराश होकर राजकुमारों ने इसकी सूचना अपने पिता को दी । क्रोधित होकर सगर ने आदेश दिया । कि घोड़े को पाताल में जाकर ढूंढो । पाताल में घोड़े को खोजते खोजते वे कपिल के आश्रम में पहुँच गये । और देखा कपिल तपस्या में लीन हैं । और उन्हीं के पास यज्ञ का घोड़ा बँधा है । उन्होंने कपिल को घोड़े का चोर समझकर उनके लिये अनेक दुर्वचन कहे । और उन्हें मारने दौड़े । कपिल की समाधि भंग हो गई । उन्होंने क्रुद्ध होकर सगर के सब पुत्रों को वहीं भस्म कर दिया । बहुत दिनों तक अपने पुत्रों की सूचना न मिलने पर सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को अपने पुत्रों तथा घोड़े का पता लगाने के लिये भेजा । अंशुमान अपने चाचाओं के द्वारा बनाए मार्ग से पाताल की ओर चल पड़ा । और रास्ते में मिलने वाले ऋषि मुनियों से पूछता हुआ उस स्थान तक पहुँच गया । जहाँ पर उसके चाचाओं के भस्म शरीरों की राख पड़ी थी । और पास ही वह घोड़ा चर रहा था । अपने चाचाओं के भस्म शरीर देखकर उसे अत्यन्त दुख हुआ । उसने उनका तर्पण करने के लिये सरोवर की खोज की । किन्तु उसे कोई भी जलाशय दिखाई नहीं दिया । तभी उसकी दृष्टि अपने चाचाओं के मामा गरुड़ पर पड़ी । उन्हें प्रणाम करके अंशुमान ने पूछा । पितामह । मैं अपने चाचाओं का तर्पण करना चाहता हूँ । यदि कोई सरोवर हो तो उसका पता बताइये । यदि आपको इनकी मृत्यु के विषय में कोई जानकारी हो । तो वह भी बताने की कृपा करें । गरुड़ ने बताया । किस प्रकार इन्द्र ने घोडा चुरा कर कपिल मुनि के पास छोड़ दिया । और उसके चाचाओं ने कपिल के साथ दुर्व्यवहार किया । जिसके कारण कपिल मुनि ने उनको भस्म कर दिया । इसके पश्चात् गरुड ने कहा । कि ये सब अलौकिक शक्ति पुरुष द्वारा भस्म किये गये हैं । अतः साधारण जल से तर्पण करने से इनका उद्धार नहीं होगा । केवल हिमालय पुत्री गंगा के जल से ही तर्पण करने पर इनका उद्धार सम्भव है । अब तुम घोडा लेकर वापस जाओ । जिससे कि तुम्हारे पितामह का यज्ञ पूर्ण हो सके । गरुड़ के कहे अनुसार अंशुमान अयोध्या पहुँचे । और अपने पितामह को सारा वृत्तान्त सुनाया । सगर ने दुखी मन से यज्ञ पूरा किया । वे अपने पुत्रों के उद्धार के लिये गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे । पर ऐसा करने के लिये उन्हें कोई भी युक्ति न सूझी । सगर के देहान्त के पश्चात अंशुमान शासन करने लगा । अंशुमान के परम प्रतापी पुत्र दिलीप हुये । दिलीप के वयस्क हो जाने पर अंशुमान दिलीप को राज्यभार सौंप कर हिमालय की कन्दराओं में जाकर गंगा अवतरण के लिये तप करने लगे । किन्तु उन्हें सफलता नहीं प्राप्त नहीं हुई । और वे स्वर्ग सिधार गए । इधर जब राजा दिलीप का पुत्र भगीरथ बड़ा हुआ । तो उसे राज्यभार सौंपकर दिलीप भी गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये तप करने चले गये । पर उन्हें भी सफलता नहीं मिली । भगीरथ प्रजावत्सल राजा थे । किन्तु उनके भी कोई सन्तान नहीं हुई । वे अपने राज्यभार मन्त्रियों को देकर स्वयं गंगा अवतार के लिये गोकर्ण नामक तीर्थ पर जाकर कठोर तपस्या करने लगे । उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वर माँगने के लिये कहा । भगीरथ ने ब्रह्मा से कहा । हे प्रभो । यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं । तो यह वर दीजिये । कि सगर के पुत्रों को गंगा का जल प्राप्त हो । जिससे उनका उद्धार हो सके । इसके अतिरिक्त मुझे सन्तान प्राप्ति का भी वर दीजिये । ताकि इक्ष्वाकु वंश नष्ट न हो । ब्रह्मा ने कहा । सन्तान का तेरा मनोरथ तो शीघ्र पूरा होगा । किन्तु प्रथम वरदान देने में कठिनाई यह है । कि जब गंगा वेग के साथ पृथ्वी पर आयेगी । तो उनका वेग कौन संभालेगा । गंगा के वेग को संभालने की क्षमता शिव के अतिरिक्त किसी में नहीं है । इसके लिये तुम्हें शिव को प्रसन्न करना होगा । इतना कहकर ब्रह्मा चले गये । भगीरथ ने साहस नहीं छोड़ा । वे एक वर्ष तक पैर के अँगूठे के सहारे खड़े होकर शिव की तपस्या करते रहे । वायु के अतिरिक्त उन्होंने किसी वस्तु का सेवन नहीं किया । भगीरथ की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने भगीरथ को दर्शन देकर कहा । हे भक्त । हम गंगा को अपने मस्तक पर धारण करेंगे । यह सूचना पाकर गंगा को देवलोक का त्यागना पड़ा । उस समय गंगा देवलोक से जाना नहीं चाहती थी । इसलिये यह सोच कर कि मैं अपने प्रचण्ड वेग से शिव को बहाकर पाताल ले जाऊँगी । गंगा भयानक वेग से शिव के सिर पर अवतरित हुईं । गंगा का यह अहंकार शिव को अच्छा न लगा । उन्होंने गंगा की वेगयुक्त धाराओं को अपने जटाजूट में बांध लिया । गंगा समस्त प्रयत्न के बाद भी शंकर की जटाओं से बाहर न निकल सकी । गंगा को इस प्रकार शिव की जटाओं में विलीन होते देख भगीरथ ने फिर शंकर जी की तपस्या की । भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर शंकर ने गंगा को हिमालय पर स्थित बिन्दुसर में छोड़ दिया । छूटते ही गंगा सात धाराओं में बँट गईं । गंगा की तीन धाराएँ । ह्लादिनी । पावनी और नलिनी पूर्व की ओर प्रवाहित हुयीं । सुचक्षु । सीता और सिन्धु नाम की तीन धाराएँ पश्चिम की ओर बहने लगी । और सातवीं धारा भगीरथ के पीछे पीछे चली । जिधर भगीरथ जाते थे । उधर गंगा जाती थी । अनेक लोग उनका स्वागत कर रहे थे । जो भी उस जल का स्पर्श करता । भव बाधाओं से मुक्त हो जाता । चलते चलते गंगा उस स्थान पर पहुँची । जहाँ ऋषि जह्नु यज्ञ कर रहे थे । गंगा अपने वेग से उनकी यज्ञ सामग्री को बहाकर ले जाने लगी । इससे ऋषि को क्रोध आ गया । और उन्होंने गंगा का सारा जल पी लिया । यह देखकर सबको बड़ा विस्मय हुआ । और वे गंगा को मुक्त करने के लिये उनसे प्रार्थना करने लगे । तब जह्नु ऋषि ने गंगा को अपने कानों से निकाल दिया । और गंगा को पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया । तब से गंगा का एक नाम जाह्नवी हो गया । इस तरह गंगा भगीरथ के पीछे चलते चलते समुद्र तक पहुँच गई । और वहाँ से सगर के पुत्रों का उद्धार करने के लिये रसातल में चली गई । उनके जल के स्पर्श से भस्म हुये सगर के पुत्र उद्धार होकर स्वर्ग गये । उस दिन से गंगा के तीन नाम हुये । त्रिपथगा । जाह्नवी । भागीरथी । कपिल आश्रम में गंगा के पहुँचने पर ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर भगीरथ को वरदान दिया । कि तेरे पुण्य प्रताप से प्राप्त इस गंगा में जो मनुष्य स्नान करेगा । वह सब प्रकार के दुखों से मुक्त होकर अन्त में स्वर्ग जायेगा । जब तक पृथ्वी पर गंगा प्रवाहित रहेगी । उसका एक नाम भागीरथी होगा और सम्पूर्ण प्रथ्वीलोक में तेरा यशगान होगा ।

शनिवार, अगस्त 14, 2010

जो पति के साथ प्रिय वचन बोलती हो । वही वास्तव में पत्नी है ।

जो मनुष्य धर्म अर्थ काम मोक्ष इन चारों की सिद्धि चाहता हो । उसको सदैव सज्जनों की ही संगति करनी चाहिये । दुष्टों के साथ रहने से इस लोक अथवा परलोक का भी हित नहीं होता । नीच के साथ वार्तालाप ।दुष्ट व्यक्ति का दर्शन । शत्रु के साथी व्यक्ति से प्रेम । और मित्र का विरोध नहीं करना चाहिये । मूर्ख शिष्य को उपदेश । दुष्ट स्त्री का भरण पोषण करने से । तथा दुष्टों का किसी कार्य में सहयोग लेने से विद्वान पुरुष भी अन्त में दुखी ही होता है । काल की प्रबलता से शत्रु के साथ संधि । और मित्र से भी शत्रुता हो जाती है । अतः कार्य कारण भाव का विचार करके ही ग्यानी पुरुष अपना समय व्यतीत करते हैं । समय ही प्राणियों का पालन करता है । समय ही उनका संहार करता है । उन सभी के सोने पर समय ( काल ) जागता ही रहता है । अतः समय को जीतना बडा कष्ट साध्य है । समय पर ही प्राणी का बल क्षीण हो जाता है । समय आने पर ही प्राणी गर्भ में आता है । समय के आधार पर उसकी सृष्टि होती है और पुनः समय पर ही उसका संहार होता है । काल निश्चित ही नियम से नित्य सूक्ष्म गति वाला ही होता है । तब भी हमारे अनुभव में उसकी गति दो प्रकार से होती है । जिसका अंतिम परिणाम जगत का संग्रह ही होता है । यह गति स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकार की होती है । उत्तम प्रकृति वाले सज्जनों की संगति । संतो के साथ सतसंग सुनना । और लोभरहित मनुष्य के साथ मैत्री करने वाला कभी दुखी नहीं होता । दूसरे की निंदा । दूसरे का धन लेना । परायी स्त्री के साथ हंसी मजाक । और पराये घर में निवास कभी नहीं करना चाहिये । यदि हितकारी हो तो अन्य व्यक्ति भी अपना बन्धु हो जाता है । और बन्धु अहितकर होने पर अन्य के समान हो जाता है । जिस प्रकार अपने ही शरीर में उत्पन्न हुयी व्याधि अहितकर होती है । और दूर वन में उत्पन्न हुयी औषधि उस व्याधि को दूर करके हितकारी हो जाती है । जो मनुष्य सदैव हित में तत्पर रहता है । वही असली बन्धु है । जो भरण पोषण करता है । वही पिता है । जिस व्यक्ति पर विश्वास हो वही मित्र है ।
और जहां पर मनुष्य का जीवन निर्वाह हो वही उसका देश है । जो बीज अंकुरित हो । वही वास्तव में बीज है । जो पति के साथ प्रिय वचन बोलती हो । वही वास्तव में पत्नी है । जो पिता की असमर्थ होने पर भी सेवा करता है । वही वास्तव में पुत्र है । जो गुणवान है । उसी का जीवन सार्थक है । जो धर्म से जी रहा है । वही जीवित है । जो पत्नी ग्रहकार्य में दक्ष है । जो प्रिय बोलती है । जिसके पति ही प्राण हैं । और जो पति परायणा है । वही वास्तव में असली पत्नी है । जो नित्य स्नान करके अपने शरीर को सुगन्धित दृव्य पदार्थ से सुवासित करती है । और अल्पाहारी है । कम बोलने वाली है । सदा सब प्रकार के मंगलो से युक्त है । जो निरन्तर धर्म परायण हैं । निरन्तर पति को प्रिय है । सुन्दर मुखवाली है । तथा जो ऋतुकाल में ही पति से सहवास की इच्छा रखती है । वह उत्तम पत्नी ही है । जिसकी पत्नी विरूप नेत्रों वाली । पापिनी । कलहप्रिय । और विवाद में बड चडकर बोलती हो । वह पति के लिये वृद्धवस्था के समान ही है । जिसकी औरत पर पुरुष का आश्रय ग्रहण करने वाली हो । दूसरे के घर में रहने की इच्छा रखती हो । कुकर्म में सलंग्न हो । निर्लज्ज हो । उस पुरुष के दुख का कौन बखान कर सकता है । जिसकी औरत गुणों का महत्व समझने वाली । पति का अनुगमन करने वाली । और थोडे में संतुष्ट रहने वाली हो । पति के लिये वह सच्ची प्रियतमा है । सामान्य औरत नहीं । दुष्ट पत्नी । दुष्ट मित्र । पलटकर उत्तर देने वाला नौकर । और जिस घर में सर्प का निवास हो । वहां रहना साक्षात मृत्यु ही है । जो स्त्री सर्प के कण्ठ में रहने वाले विष के समान है । जो सांप के फ़न के समान भयंकर है । जो रौद्र रस की साक्षात मूर्ति हो । जो शरीर से काले रंग की हो । जो रक्त के समान लाल लाल आंखों से दूसरे का ह्रदय भयभीत करती हो । जो बाघ के समान भयानक हो । जो क्रोध से बोलने वाली । और प्रचण्ड अग्नि की ज्वाला के समान धधकने वाली हो । और कौवे के समान जीभ की लालची ( कुछ भी खाने की शौकीन ) हो । अपने पति से प्रेम न रखने वाली हो । भृमित चित्त वाली । दूसरों के घर नगर आदि में जाने वाली । पराये पुरुष की इच्छा रखने वाली । ऐसी स्त्री से सदा दूर रहने में ही कल्याण है । भाग्य से कभी कमजोर भी ताकतवर हो सकता है । दुष्ट व्यक्ति भी भला कर सकता है । अग्नि में भी शीतलता आ सकती है । हिम में गर्मी आ सकती है । किन्तु वैश्या के ह्रदय में किसी के लिये सच्चा अनुराग नहीं हो सकता । घर के अन्दर भयंकर सर्प देख लिये जाने पर । चिकित्सा होने पर भी रोग बने रहने पर । बाल युवा आदि अवस्था से युक्त यह शरीर काल से घिरा हुआ है । यह समझने पर ऐसा कौन सा व्यक्ति है । जो धैर्य धारण कर सकता है ।

हथियार धारी पुरुष और चंचल स्त्री विश्वास करने योग्य नहीं होते ।

पक्षी फ़लरहित वृक्ष का त्याग कर देते हैं । सारस आदि पक्षी सूखे जलाशय को त्याग देते हैं । वैश्य़ाएं धनहीन होते ही पुरुष को त्याग देती हैं । मन्त्री भृष्ट राजा को त्याग देते हैं । भोंरे मुर्झाये पुष्प को त्याग देते हैं ।
और हिरन जले हुये वन को त्याग देते हैं । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सभी प्राणी स्वार्थवश ही एक दूसरे से प्रेम करते हैं । वास्तव में कौन किसका प्रिय है ? आपत्तिकाल में मित्र । युद्ध में वीरता । एकान्त स्थान में शुचिता । धन के खत्म हो जाने पर पत्नी । तथा अकाल के समय अतिथप्रियता की पहचान होती है ।
आपत्तिकाल के लिये धन को संचय करना चाहिये । स्त्रियों की रक्षा के लिये धन का उपयोग करना चाहिये । एवं अपनी रक्षा में स्त्री और धन दोनों का उपयोग करना चाहिये । कुल की रक्षा के लिये एक व्यक्ति का ।
ग्राम की रक्षा के लिये कुल का । जनपद के हित के लिये ग्राम का । और अपने वास्तविक कल्याण के लिये प्रथ्वी का भी त्याग कर देना चाहिये । धन देकर लोभी को । करबद्ध प्रणाम निवेदन से उदार चित्त व्यक्ति को । प्रसंशा करने से मूर्ख व्यक्ति को । तत्व चर्चा से विद्वान पुरुष को संतुष्ट किया जा सकता है । विनम्र निवेदन से सज्जन पुरुष को । भेद नीति से धूर्त को । अपने से कम शक्ति वाले को थोडा बहुत देकर । और अपने समान शक्ति वाले को अपेक्षा के अनुरूप धन देकर वश में किया जा सकता है । जिसका जैसा स्वभाव हो । उसके अनुरूप वैसे ही वचन बोलते उसके ह्रदय में प्रवेश कर चतुर व्यक्ति को यथाशीघ्र उसे अपना बना लेना चाहिये । नदी । नाखून । सींग वाले पशु । हथियार धारी पुरुष और चंचल स्त्री विश्वास करने योग्य नहीं होते । जो मनुष्य बुद्धिमान है उसको अपनी धन की क्षति । घर में हुआ दुश्चरित्र । तथा अपमान की घटना दूसरे के सामने नहीं कहना चाहिये । नीच और दुष्ट व्यक्ति की समीपता । अत्यन्त विरह वियोग । सम्मान । दूसरे से प्रेम और दूसरे के घर में रहना ये सभी औरत के चरित्र को एक न एक दिन नष्ट कर ही देते हैं । किस के कुल में दोष नहीं है । रोग से कौन पीडित नहीं है । कौन दुखी नहीं है ? धन सदैव ही किसके पास रहा है ? धन पाकर किसको अहंकार नहीं हुआ ? किस पर विपत्तियां नहीं आयीं ? सुन्दर स्त्रियों द्वारा किसका मन क्षुब्ध नहीं हुआ ? कौन है जो कभी मरा नहीं ? किस भिखारी का स्वाभिमान नहीं
नष्ट हुआ ? कौन दुष्ट के जाल में फ़ंस जाने पर सुख से रह पाया ? अर्थात ऐसा कोई नहीं है । विध्या का अभ्यास न करने पर वह नष्ट हो जाती है । सामर्थ्य रहते हुये भी फ़टे पुराने मैले कुचैले वस्त्र पहनने वाली स्त्री का सौभाग्य नष्ट हो जाता है । सुपाच्य भोजन से रोग नष्ट हो जाता है । चतुराई युक्त नीति से शत्रु नष्ट हो जाता है । पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का आहार दुगना । बुद्धि चौगुनी । कार्य करने की क्षमता छह गुनी । और कामवासना आठ गुनी अधिक होती है । स्वप्न से नींद को नहीं जीता जा सकता । कामवासना से स्त्री नहीं जीती जा सकती । ईंधन से अग्नि को त्रप्त नहीं किया जा सकता । शराब से प्यास नहीं बुझायी जा सकती । मांस युक्त । अधिक चिकनाई का भोजन । शराब का सेवन । पान । सुगन्धित पदार्थों का लेपन । सुन्दर वस्त्र और सुन्दर खुशबू युक्त फ़ूल हार आदि ये स्त्रियों की कामवासना को बडाते हैं । जैसे अधिक से अधिक लकडियों के ढेर से अग्नि संतुष्ट नहीं होती । नदियों के अनेक समूह अपने में मिलने से समुद्र संतुष्ट नहीं होता । यमराज अधिक से अधिक प्राणियों का संहार करके भी संतुष्ट नहीं होता । ऐसे ही औरत की कामवासना भी असंख्य पुरुषों के साथ सम्भोग करने पर भी संतुष्ट नहीं होती । जो स्त्रियां स्वभाव से ही धर्म विरुद्ध आचरण करने वाली हैं । एवं पति के प्रति प्रतिकूल व्यवहार रखने वाली हैं । वे स्त्रियां न धन आदि के दान । न सम्मान । न सरल व्यवहार । न सेवा भाव । न शस्त्र भय । न शास्त्र उपदेश से ही अनुकूल की जा सकती हैं । अर्थात वे सदा प्रतिकूल ही रहती हैं । जिन्होंने बाल्यकाल से ही विध्यार्जन नहीं किया ।
जिनके द्वारा युवावस्था में धन और स्त्री की प्राप्ति नहीं की जा सकी । वे इस संसार में शोक के पात्र ही हैं । और मनुष्य रूप धारण करके पशुवत ही विचरण करते हुये दुख से भरा जीवन जीते हैं । जो बाल्यावस्था में विध्या अध्ययन नहीं करते । और फ़िर युवावस्था में कामातुर होकर धन यौवन को नष्ट कर देते हैं । वे वृद्धावस्था में चिंता से जलते हुये शिशिरकाल में कोहरे से झुलसे हुये कमल पुष्प के समान दुखी जीवन ही व्यतीत करते हैं । आकार संकेत गति चेष्टा वाणी नेत्र और मुख की भाव भंगिमा से प्राणी के अंतकरण में छिपा हुआ भाव प्रकट होता रहता है । विद्वान वह है । जो दूसरे के द्वारा न कहा गया विषय भी जान लेता है । बुद्धि वह है । जो दूसरे के संकेत मात्र से ही समझ जाय । कहे गये शब्द का अर्थ तो पशु भी समझ लेते हैं । मनुष्य के दिखाये गये मार्ग पर तो हाथी घोडे भी आसानी से चलते हैं ।

पैर में गडे हुये कांटे को मनुष्य हाथ के कांटे से ही निकालता है ।

बोलचाल की निपुणता से रहित व्यक्ति की विध्या । और कायर पुरुष के हाथ में मौजूद हथियार । उन्हें वैसे ही संतुष्टि प्रदान नहीं कर सकते । जैसे अपने अंधे पति के साथ रहती हुयी उसकी स्त्री अपने रूप सौन्दर्य से पति को त्रप्त नहीं कर सकती । सुन्दर भोज्य पदार्थ उपलब्ध हों और भोजन करने की शक्ति भी हो यानी उन्हें पचाने की क्षमता हो । रूपवती यौवन से भरपूर स्त्री हो और सहवास करने की पूर्ण क्षमता भी हो । भरपूर धन हो और दान करने की भी सामर्थ्य हो यानी दान करने की इच्छा रखता हो । ये सब अल्प तपस्या के फ़ल नहीं हैं । अर्थात बडे पुन्य करने से मिलते हैं । विध्या का फ़ल शील और सदाचार है । स्त्री का फ़ल रतिक्रिया और पुत्रवान होना है । तथा धन का फ़ल दान और भोग होता है । विद्वान व्यक्ति को श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न कुरूप कन्या से भी विवाह कर लेना चाहिये । किन्तु रूपवती एवं अच्छे लक्षणों वाली लेकिन उत्तम कुल से हीन कन्या को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिये । दुष्ट के साथ मित्रभाव और सर्प का विषहीन होना सम्भव नहीं है । वह कुल पवित्र नहीं होता जिसमें स्त्रियां ही उत्पन्न होती हैं । अपने कुल के साथ प्रभु भक्ति जोड देनी चाहिये । पुत्र को विध्या अध्ययन में लगाना चाहिये । शत्रु को व्यसन में लगाना चाहिये । तिरस्कृत होने पर भी धैर्यसम्पन्न सज्जन व्यक्ति के गुण कभी आन्दोलित नहीं होते । दुष्ट के द्वारा नीचे कर दी गयी अग्नि की शिखा कभी नीचे नहीं आती । उत्तम जाति का घोडा कभी अपने मालिक का चाबुक प्रहार । सिंह हाथी की गर्जना । और वीर शत्रु की ललकार सहन नहीं कर सकता । यदि सज्जन मनुष्य दुर्भाग्य से कभी धनहीन हो भी जाता है । तो भी वह दुष्टों की सेवा करने की अभिलाषा नहीं रखता । और न ही नीचजनों का सहारा लेता है । जैसे भूख से अत्यन्त पीडित होने पर भी शेर घास नहीं खाता । अपितु हाथियों के गर्म रक्त का ही पान करता है । जिस मित्र में एक बार भी दुष्ट भाव दिखाई दे जाता है । और फ़िर भी कोई उससे दुबारा मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने की चाह रखता है । वह मानों खच्चरी के द्वारा धारण किये गये गर्भ के समान ही मृत्यु को पाने की इच्छा रखता है । उपकार के द्वारा वशीभूत हुये शत्रु से अन्य शत्रु को समूल ही उखाड फ़ेंकना चाहिये । क्योंकि पैर में गडे हुये कांटे को मनुष्य हाथ के कांटे से ही निकालता है ।
सज्जन मनुष्य को अपकारी के नाश की कभी चिंता नहीं करनी चाहिये । क्योंकि वह नदी के तट पर खडे वृक्ष की भांति स्वयं ही नष्ट हो जाता है । एक ही व्यक्ति में सभी ग्यान नहीं होता । इसलिये ये सर्वमान्य है । कि सभी व्यक्ति सभी कुछ नहीं जानते । और किसी भी बात में सभी सर्वग्य नहीं हैं । इस संसार में न कोई पूरा ग्याता है और न कोई पूरा मूर्ख । उत्तम मध्यम निम्न व्यक्ति जितना भी ग्यान जानता है । उसे उतने में विद्वान समझना चाहिये । क्या इसमें कोई संदेह है ?

जिन्दगी एक दिन में ही मृत्यु का बहाना लेकर समाप्त हो सकती है ।

इस क्षणभंगुर जीवन में आप सब निश्चित क्यों हैं ? दूसरे का हित करना उचित है । जो बाद में कल्याणकारी होता है । इस परोपकार धर्म से विपरीत कामिनिंयो के कटीले कटाक्ष से काम पीडित sex feeling आप सब के द्वारा जो आनन्द महसूस किया जाता है । क्या उसी में आपका वास्तविक हित है ? ऐसे आचरण से तो कभी भी हित सम्भव नहीं है । अतः इस प्रकार पाप क्यों करते हैं । आप को कुछ समय तो पारलौकिक सुधार हेतु भक्ति भजन में लगाना ही चाहिये । क्योंकि जल में डूबे हुये घडे के समान जिन्दगी एक दिन में ही मृत्यु का बहाना लेकर समाप्त हो सकती है । क्या इसमें कोई संदेह है ?
ऐश्वर्य कभी स्थायी नहीं होता । अतः कुछ दिन के लिये प्राप्त हुये अस्थिर ऐश्वर्य में आसक्त न होकर मनुष्य को अपनी बुद्धि धर्माचरण और साथ साथ परलोक सुधार में भी लगानी चाहिये । धन सम्पत्ति आदि तो क्षण भर में ही नष्ट हो जाता है । क्योंकि धन को अधीन रखना मनुष्य के हाथ की बात नहीं है । मन को लुभाने वाली सुन्दर स्त्रियां एक बार को सत्य हो सकती है । धन सम्पत्ति भी सत्य हो सकती है । किन्तु यह जीवन तो चंचला स्त्री के काम कटाक्ष की भांति ही असत्य है । शरीर में तेजी से आता बुडापा मुंह फ़ाडे शेर के समान भयभीत करता है । रोग शत्रु की भांति शरीर में उत्पन्न होते ही रहते हैं । आयु फ़ूटे हुये घडे से रिसते जल के समान शीघ्रता से खत्म होती ही जा रही है । फ़िर भी इस संसार में कोई भी मनुष्य अपने लिये ही आत्महित चिंतन में प्रवृत्त नहीं होता । ये कैसी दुख की बात है । क्या इसमें कोई संदेह है ?
जो मनुष्य परायी स्त्रियों में मातृभाव रखता है । जो दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान समझता है ।और सभी प्राणियों में अपने ही स्वरूप का दर्शन ( आत्मदर्शन ) करता है । वही सच्चा साधु है । जिसके पास धन है । उसी के मित्र एवं बन्धु बान्धव है । वही इस संसार में पुरुष है । और वही धन सम्पन्न व्यक्ति है ।
धन रहित होने पर मनुष्य को अपने ही मित्र पुत्र स्त्री तथा परिवार वाले त्याग देते हैं । धनवान होने पर वे सब पुनः उसके पास लौट आते हैं । क्योंकि इस संसार में धन को ही सब कुछ माना जाता है । क्या इसमें कोई संदेह है ?
आपत्तिकाल आने पर मनुष्य को दुखी नहीं होना चाहिये । तब उसे सम बुद्धि । प्रसन्न आत्मा । तथा सुख दुख में समान रहना चाहिये । धैर्यवान मनुष्य कष्ट प्राप्त करके भी दुखी नहीं होते । क्योंकि राहु के मुख में प्रविष्ट हुआ चन्द्रमा क्या फ़िर से उदय नहीं होता ? शरीर के लालन पालन में ही लगे रहने वाले मनुष्य के प्रति धिक्कार है । धिक्कार है । मनुष्य को धनहीन होने से क्षीण हुये शरीर के प्रति भी दुख नहीं करना चाहिये । क्योंकि सब जानते हैं । कि पतिवृता पत्नी सहित पांडव और युधिष्टर ने अपने आपत्तिकाल के दुख से मुक्त होकर पुनः सुख प्राप्त किया था । अतः अनुकूल समय की प्रतीक्षा धैर्य के साथ करनी चाहिये । क्या इसमें कोई संदेह है ? अर्थात इसमें कोई संदेह नहीं है ।

बुधवार, अगस्त 11, 2010

वैसी ही उसकी परलोक गति भी होती है ।

इस मर्त्य लोक में आत्म ग्यानियों का शासक गुरु । दुरात्माओं का शासक राजा । और गुप्त रूप से पाप करने वालों का शासक सूर्य का पुत्र यम है । अपने पाप का प्रायश्चित न करने पर जीव को अनेक प्रकार के नरक प्राप्त होते हैं । तत्पश्चात नरक की यातनाओं को भोगने के बाद प्राणी मर्त्य लोक में जन्म लेते हैं । मानव योनि में जन्म लेकर भी वे अपने पूर्व के पापों से चिह्नित रहते हैं । जैसे पिछले जन्म का झूठ बोलने वाला फ़िर से जन्म लेने पर हकलाकर बोलने वाला होता है । इन्द्रियों के पाप के विषय करके झूठ बोलने वाला गूंगा ।महात्मा आदि को मारने वाला कोढी । शराब पीने वाला । काले रंग के दांत वाला । गुरु पत्नी गामी चर्म रोगी । पापियों से सम्बन्ध रखने वाला नीच योनि में जन्म लेता है । दान न देने वाला निर्धन । कक्ष को जलाने वाला जुगनू । पात्र को विध्या न देने वाला वैल । दूसरे को वासी अन्न देने वाला कुत्ता । फ़लों की चोरी करने वाले की संतान की मृत्यु हो जाती है । मरने के बाद वह बन्दर की योनि में जाता है । फ़िर वैसा ही मुख प्राप्त करके मानव योनि में उत्पन्न होता है । पहले संयास लेकर फ़िर से ग्रहस्थ हो जाने वाला मरुभूमि का पिशाच बनता है । युवावस्था को प्राप्त न हुयी कन्या से सम्भोग करने वाला सर्प बनता है ।
रानी के साथ चुपके से सम्भोग करने वाला दंष्ट्री होता है । गुरु पत्नी से सम्भोग करने वाला गिरगिट होता है । इस प्रकार दूसरे का थोडा या बहुत किसी भी प्रकार जो कुछ भी मनुष्य बुरा व्यवहार करता है । वह उस पाप से निश्चय ही तिर्यक योनि ( कीट पतंगा आदि ) में जाता है । ये पूर्व जन्म के कुछ चिह्न तो होते ही हैं । इसके अतिरिक्त भी बहुत से चिह्न होते है । जो अपने अपने कर्म के अनुसार प्राणी के शरीर में उपस्थित होते हैं । ऐसा पापी अनेको दुख भोग कर के । नरक भोग कर के । बचे कर्म फ़ल के अनुसार इन योनियों में जन्म लेता है । उसके बाद फ़िर से मृत्यु हो जाने पर जब तक उसके शुभ और अशुभ कर्म समाप्त नहीं हो जाते । तब तक सभी योनियों में उसका बार बार जन्म मृत्यु होती ही रहती है । इसमें कोई संशय नहीं है । जब आदमी और औरत के सम्भोग से गर्भ में शुक्र और रज स्थापित हो जाता है । तब पंच भूतों से समन्वित होकर यह पंचभौतिक शरीर जन्म लेता है । इसके बाद उसमें इन्द्रियां मन प्राण ग्यान आयु सुख धैर्य धारणा प्रेरणा दुख मिथ्या अहंकार यत्न आकृति रंग राग द्वेष और उत्पत्ति विनाश ये सब उस अनादि आत्मा को सादि मानकर पंचभौतिक शरीर के साथ उत्पन्न होते हैं । उस समय वह शरीर पूर्व कर्मों से घिरा हुआ गर्भ में बडता है । चार प्रकार की चौरासी लाख योनियों में जीवों का इस प्रकार के परिवर्तन का चक्र निरन्तर घूमता ही रहता है । उसी चक्र में शरीर धारियों की उत्पत्ति और विनाश होता है । अपने
धर्म का पालन करने से प्राणियों को उच्च गति और अधर्म करने से नीच गति प्राप्त होती है । देव और मानव योनि में जो दान और भोग आदि की क्रियाएं दिखाई देती हैं । वे सब कर्मों के फ़ल हैं । घोर अकर्म तथा काम क्रोध से अर्जित अशुभ पापाचार से नरक प्राप्त होता है । तथा वहां से जीव का उद्धार नहीं होता । क्या इसमें कोई संशय है ? अर्थात इसमें कोई संशय नहीं है । भारत वर्ष में मानव योनि तेरह जातियों में विभक्त है । यदि उसको प्राप्त करके मनुष्य अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक उत्सर्ग करता है तो उसका पुनर्जन्म नहीं होता । राग द्वेष रूपी मल को दूर कर देने वाले । ग्यान रूपी जलाशय में । सत्य रूपी जल से युक्त । जिसने मानस तीर्थ में स्नान कर लिया । वह फ़िर कभी पापों से संलिप्त नहीं होता । देवता भगवान कभी पत्थर और काष्ठ की मूर्ति में नहीं रहते । वे तो प्राणी के भाव में रहते हैं । इसलिये सद भाव से युक्त भक्ति का ही आचरण करना चाहिये । मछुआरे प्रतिदिन सुबह ही नर्मदा सरयू गंगा यमुना जैसी पवित्र नदियों का दर्शन करते हैं । स्नान भी करते हैं । किन्तु क्या उन्हें शिवलोक प्राप्त हो सकता है क्या उनकी आगे की सदगति हो सकती है ? नहीं । क्योंकि उनकी चित्तवृति दूसरी ओर बलबान होती है । मनुष्य़ के चित्त में जैसा विश्वास होता है । वैसा ही उसे कर्म फ़ल प्राप्त होता है । वैसी ही उसकी परलोक गति भी होती है ।
इसी मनुष्य जीवन मे प्राणियों के लिये मोक्ष मार्ग है ।इसी मनुष्य जीवन मे प्राणियों के लिये स्वर्ग मार्ग भी है । ये दोनों अलग है । प्रायः मनुष्य स्वर्ग को ही मोक्ष मान लेते है । अतः मनुष्य को जीवन और मरण इन दो तत्वों पर सदा ही ध्यान देना चाहिये । दस कूप के समान एक बाबली होती है । दस बाबली के समान एक सरोवर होता है । दस सरोवर के समान वह पोंसरा होती है । जो वापी जल रहित वन अथवा देश में किसी के द्वारा बनवायी जाती है । जो दान निर्धन को दिया जाता है । तथा जो दया प्राणियों पर की जाती है । उसके पुन्य से उन्हें करने वाला स्वर्ग को प्राप्त होता है । व्यर्थ के कार्यों को छोडकर निरन्तर धर्माचरण करना चाहिये । इस प्रथ्वी पर दान दम और दया ये तीन सार कर्म हैं । दरिद्र । सज्जन ब्राह्मण को दान । अनाथ प्रेत ( जिस मृतक का किसी के द्वारा संस्कार न किया गया हो ) का संस्कार । करोडों यग्य का फ़ल देता है । इसमें कोई संशय है ? अर्थात इसमें कोई संशय नही है ।

वैतरणी नाम की महा नदी

यमलोक के रास्ते में जो वैतरणी नाम की महा नदी पडती है । वह बेहद अगाध दुस्तर और देखने मात्र से पापियों को भयभीत करने वाली है । वह पीव और रक्त जैसे जल से भरी हुयी है । मांस के लोथडों जैसे कीचड से भरी हुयी । और मृत्यु के बाद तट पर आये हुये पापियों को देखकर । ये उन्हें भयभीत करने वालेअनेक रूप धारण कर लेती है । जैसे कडाही में अग्नि पर रखा हुआ घी खौलता है । वैसे ही पापी के उतरते ही इसका जल खौलने लगता है । इसका जल कीटाणुओं और कटीली सूंड जैसे जीवों से भरा हुआ है । सूंस घडियाल । वज्रदन्त जैसे मांसभक्षक हिंसक जीवों से यह नदी भरी हुयी है । प्रलय के समय बारह सूर्य उदयहोकर जिस प्रकार विनाशलीला करते हैं । वैसे ही ये सूर्य वहां सदैव तपते रहते हैं । तब उसके महाताप में जलते हुये पापी दुखी होकर हा माता हा पिता आदि चिल्लाते हुये विलाप करते हैं । वे जीव उस महाभयंकर धूप में इधर उधर भागते हैं । उस बेहद दुर्गन्ध युक्त जल में डुबकी लगाते हैं । और आत्मग्लानि से दुखी होते हैं । धर्मात्माओं को इस नदी में रुकना नहीं होता । वैतरणी नाम की एक लाल रंग और काले रंग की गाय होती है । अपने जीवन में उसका दान करने वाले और अन्य परोपकार करने वालों को वहां उपस्थित नाविक द्वारा सुख से वह नदी पार करा के आगे पहुंचा दिया जाता है । मकर संक्रान्ति और कर्क संक्रान्ति । व्यतीपात योग । दिनोदय । सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण । अमावस्या अथवा पुन्यकाल आने पर दान दिया जाता है । या मन में दान देने की जब श्रद्धा और अवसर आ जाय । वही दान का सर्वोत्तम समय है । क्योंकि सम्पत्ति अस्थिर है । शरीर का कोई भरोसा नहीं । धन भी सदा रहने वाला नहीं । मृत्यु जन्म के समय से ही छाया रूप होकर पीछे चलती है । ( धूप आदि में शरीर की जो छाया दिखाई देती है । वह मृत्यु का रूप है । मृत्य का समय आ जाने पर उस व्यक्ति को ये छाया दिखाई नहीं देती । देव प्रेत आदि योनियों की भी छाया दिखाई नहीं देती । क्योकि इनकी मृत्यु नही होती बल्कि समय पूरा होने पर उन्हें उस लोक से गिरा दिया जाता है । हम लोगों ने बहुत ऊपर आकाश में जब कभी चमकीला प्रकाश नीचे टूटता हुआ देखा होगा । जिसे भारत और अन्य देशों में तारा टूटना भी कहते हैं । ये उच्च लोकों से देवता आदि समय पूरा होने पर गिरा दिये जाते हैं । वही कुछ सेकंड के लिये हमें दिखाई देता है । ) सतकर्म और दान के प्रभाव से प्राणी को एहिक और पारलौकिक सुख की प्राप्ति होती है । स्वस्थ जीवन में दान देने से हजार गुना । रोग अवस्था में स्वार्थवश दान देने से सौ गुना । और मृत्यु के पश्चात मृतक के निमित्त दिया गया दान उतना ही मिलता है । जितना दिया गया हो । अतः मनुष्य को यथासंभव अपने ही हाथ से दान करना चाहिये । मरने के बाद कौन किसके लिये क्या दान और उपकार करेगा । इसमें भारी संशय ही है । इस नश्वर देह से स्थिर कर्म करना चाहिये । ये प्राण और ये जीवन एक मेहमान की भांति है । कब छोड जायेंगे । ये किसको पता है । अर्थात कोई पता नहीं ? धर्म की जीत होती है । अधर्म की नहीं । सत्य की जीत होती है । असत्य की नहीं । क्षमा की जीत होती है । क्रोध की नहीं । जिसकी बुद्धि इस प्रकार की होकर स्थिर भाव हो जाती है । उसकी कभी दुर्गति नहीं होती ।

शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

ये छह प्रकार के स्नान हैं ।

रात में सोये हुये व्यक्ति के मुख से निरंतर लार आदि अपवित्र मल गिरते हैं । अन्य स्थानों से भी मल की निकासी होती है । इसलिये पूरा शरीर ही अपवित्र हो जाता है । इसलिये सुबह शौचादि का बाद स्नान करना बेहद लाभदायक होता है । सुबह स्नान करने से अलक्ष्मी । कालकर्णी यानी विघ्न डालने वाली अनिष्टकारी शक्तिया । दुस्वप्न और दुर्विचार चिंतन से होने वाले पाप धुल जाते हैं । बिना स्नान के किये गये कार्य सफ़ल नहीं होते । अतः यथासंभव स्नान अवश्य करना चाहिये ।
किसी प्रकार से अशक्त होने पर बिना सर पर जल डाले ही स्नान कर लें । अन्य स्थिति में गीले वस्त्र से शरीर को ठीक से पोंछ लें । इसे कायिक स्नान कहते हैं । बाह्य । आग्नेय । वायव्य । दिव्य । वारुण । यौगिक । ये छह प्रकार के स्नान हैं । मन्त्र सहित कुश के द्वारा जल से स्नान करना बाह्य स्नान है ।
सिर से पैर तक भस्म के द्वारा अंगो को लेपन करना यह आग्नेय स्नान है । गोधूलि से शरीर को पवित्र करना
वायव्य स्नान है । यह उत्तम स्नान है । धूप में होने वाली बरसात में किया गया स्नान दिव्य स्नान कहलाता
है । जल में अवगाहन करना वारुण स्नान है । योग द्वारा ध्यान क्रिया में स्नान करना यौगिक स्नान है ।यौगिक स्नान योगी आदि ही कर पाते हैं । इसे दूसरे शब्दों में आत्मतीर्थ कहते हैं । स्नान से पहले दूध युक्त वृक्षों की लकडी । मालती । अपामार्ग । बिल्ब । करवीर । कनेर की दातौन लेकर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर स्वच्छ स्थान में दांत साफ़ करने चाहिये ।

सर्प द्वारा डसने पर ..?

शमशान । वल्मीक या बांबी । पर्वत । कुंआ । वृक्ष के कोटर । इन स्थानों में स्थित सर्प के काट लेने पर यदि दांत लगे स्थान पर तीन प्रच्छन रेखाएं बन जाती है । तो वह आदमी जीवित नहीं बचेगा । षष्टी तिथि । कर्क और मेष राशि में आने वाले नक्षत्र । मूल ।अश्लेषा । मघा आदि क्रूर नक्षत्र में भी सर्प द्वारा काटने से आदमी जीवित नहीं रहता । बगल । कमर । गला । सन्धि स्थान । मस्तक । कनपटी के अस्थिभाग । उदर । में सांप द्वारा काटने पर आदमी जीवित नहीं रहता । सर्पदंश के समय । दण्डी । शस्त्रधारी । भिखारी । तथा नग्न आदमी या औरत दिखाई दे तो उसे काल का दूत ही समझो । हाथ । मुख । गर्दन । पीठ में सर्प द्वारा काटने पर भी आदमी जीवित नहीं रहता । दिन के प्रथम भाग के पूर्व । अर्धयाम । का भोग सूर्य करता है । इस सूर्य भोग के बाद गणनाक्रम में जो ग्रह आते है । उन ग्रहो के द्वारा क्रम अनुसार शेष यामों का भोग होता है । कालगति में प्रत्येक दिन छः परिवर्तनों के साथ शेष ग्रहों का भोग माना जाता है । ज्योतिषियों ने कालचक्र के आधार पर रात्रि में शेषनाग । सूर्य । वासुकि नाग । चन्द्र । तक्षक नाग । मंगल । कर्कोटक । बुध । पद्म । गुरु । महापद्म नाग । शुक्र । शंख नाग । शनि । कुलिक । राहु को माना गया है ।
रात या दिन में ब्रहस्पति का भोगकाल आने पर सर्प देवताओं का भी अंत कर देने वाला होता है । अतः इस समय काटा आदमी किसी भी हालत में नहीं बच सकता । दिन में शनि की वेला होने पर राहु अशुभ धर्म से संयुक्त होता है । इसलिये वह अपने याम भोग और सन्धिकाल में अवस्थित में काल यानी यमराज की तरह गति वाला होता है । रात और दिन का मान तीस । तीस घटी का होता है । इस मान के अनुसार बने कालचक्र में । चन्द्रमा प्रतिपदा तिथि को पाद अंगुष्ठ । द्वितीया पैर से ऊपर । तृतीया गुल्फ़ । चतुर्थी जानु । पंचमी लिंग । छठी नाभि । सप्तमी ह्रदय । अष्टमी स्तन । नवमी कण्ठ । दशमी नासिका । एकादशी नेत्र । द्वादशी कान । त्रयोदशी भोंह । चर्तुदशी कनपटी । पूर्णिमा और अमावस्या को मस्तक पर निवास करता है । पुरुष के दांये भाग में तथा स्त्री के बांये भाग में चन्द्रमा की स्थिति होती है । जिस अंग में चन्द्र स्थित होता है । उस अंग में सर्प द्वारा डसने पर आदमी बच सकता है । यधपि सर्पदंश से उत्पन्न मूर्छा बहुत देर तक रहती है । फ़िर भी शरीर मर्दन से उसमें काफ़ी लाभ होता है । और वह दूर हो जाती है ।

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

जडी बूटियों के विभिन्न नाम 1

लेखकीय -- अक्सर आयुर्वेद की औषधियों ।एक ही जडी बूटियों के कई नामों से लोगों को भृम हो जाता है । और वो किसी ग्रन्थ में दूसरे नाम से लिखी औषधि को नहीं जान पाते । ऐसी ही औषधियों के पर्यायवाची
यहां हैं । इसके अलावा दो अन्य भाग भी प्रकाशित किये जायेंगे ।
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महानिम्ब को बृहनिम्ब तथा दीप्यक को यवनिका या अजवाइन कहा जाता है ।
विडंग का नाम क्रिमिशत्रु है । हिंगु । हींग को रामठ भी कहते हैं ।
अजाजी । जीरक । जीरे से कहते हैं । उपकुंचिका को कारवी कहते हैं ।
कटुला । तिक्ता । कटुरोहिणी । कटु नाम की औषधि से कहते हैं ।
तगर । नत । वक्र से कहते हैं । चोच । त्वच । वरांड्ग्क । दारुचीनी से कहते हैं ।
उदीच्य को बालक । मोथा कहते हैं । हीबेर को अम्बुबालक भी कहते हैं ।
पत्रक । दल । तेजपत्ता से । आरक को तस्कर कहते हैं ।
हेमाभ । नाग । नागकेशर । इनको एक ही समझना चाहिये ।
असक । काश्मीरबाह्यीक । कुंकुम से कहते हैं । पुर । कुटनट । महिषाक्ष । पलंड्कषा । गुग्गुल से कहते हैं ।
काश्मीरी । कटफ़ला । श्रीपर्णी इनको एक ही समझना चाहिये ।
शल्लकी । गजभक्ष्या । पत्री । सुरभी । श्रवा । गजारी से कहते हैं ।
आंवला को धात्री । आमलकी । तथा बहेडा को अक्ष एवं विभीतक भी कहते हैं ।
हर्र को पथ्या । अभया । पूतना । हरीतकी भी कहते हैं ।
करंज । कंजा । उदकीर्य्य । दीर्घवृत । इनको एक ही समझना चाहिये ।
यष्टी । यष्टयाह्यय । मधुक । मधुयष्टी । जेठी मधु से कहते हैं ।
औषधि की जड को मूल या ग्रन्थिक भी कहते हैं ।
ऊषण । मरिच को । तथा विश्वा । शुण्ठी । सोंठ को कहते हैं ये महाऔषधि है ।
व्योष । कटुत्रय । त्र्यूषण । को एक ही समझें ।
लांगली को हलिनी । और । शेयसी को गजपिप्पली कहते हैं ।
त्रायन्तीका । त्रायमाणा । उत्सा । सुवहा । इनको एक ही समझना चाहिये ।
चित्रक । शिखी । वह्यि । अग्नि । को एक ही समझें ।
षडग्रन्था । उग्रा । श्वेता । हेमवती । वचा से कहते हैं ।
कुटज । शक्र । वत्सक । गिरिमल्लिका से कहते हैं । इसके बीजों को कलिंड्ग । इन्द्रयव । अरिष्ट कहते हैं ।
मुस्तक । मेघ । मोथा से । तथा कौन्ती को हरेणु भी कहते हैं ।
एला और बहुला बडी इलायची से । सूक्ष्मैला । त्रुटि । छोटी इलायची से कहते हैं ।
भार्ड्गी । पद्मा से । तथा कांजी । ब्राह्मण्यष्टिका से कहते हैं ।
मूर्वा । मधुरसा । और तेजनी । तिक्तवल्लिका से कहते हैं ।
स्थिरा । विदारीगन्ध । शालपर्णी । अंशुमती । एक ही औषधि है ।
लाड्ग्ली । कलसी । क्रोष्टापुच्छा । गुहा । इनको एक ही समझना चाहिये ।
पुनर्नवा । वर्षाभू । कठिल्या । करुणा । ये एक ही हैं ।
एरण्ड को उरूवक । आम । वर्धमानक । नाम से जाना जाता है ।
झषा और नागबला एक ही औषधि के नाम है ।
गोक्षुर । गोखुरू । श्वदंष्ट्रा । एक ही औषधि है ।
शतावरी । वरा । भीरु । पीवरी । इन्दीवरी तथा वरी के नाम से जानी जाती है ।
व्याघ्री । कृष्णा । हंसपादी । मधुस्रवा । वृहती । एक ही औषधि है ।
कण्टकारी । कटेरी । क्षुद्रा । सिंही । निदिग्धिका । इनको एक ही समझना चाहिये ।
वृश्चिका । त्र्यमृता । काली । विष्घनी । सर्पदंता । एक ही औषधि के नाम हैं ।
मर्कटी । आत्मगुप्ता । आर्षेयी । कपिकच्छुका । एक ही औषधि है ।
मुद्रपर्णी । क्षुद्रसहा । मूंग से कहते है । माष्पर्णी एवं महासहा । उडद से कहते हैं ।
दन्डयोन्यड्क । दन्डिनी । त्यजा । परा । महा । इनको एक ही समझना चाहिये ।
न्यग्रोध । वट । बरगद । से तथा अश्वत्थ । कपिल । पीपल से कहते हैं ।
प्लक्ष । गर्दभांड । पर्कटी । कपीतन । को एक ही समझें ।
अर्जुन वृक्ष । पार्थ । कुकुभ । धन्वी । इनको एक ही समझना चाहिये ।
नन्दीवृक्ष । प्ररोही । पुष्टिकारी । ये एक ही हैं ।
वंजुल और वेतस एक ही हैं ।
भल्लातक । अरुष्कर । भिलावा । इनको एक ही समझना चाहिये ।
लोध्र । सारवक । धृष्ट । तिरीट । को एक ही समझें ।
बृहत्फ़ला । महाजम्बु । बालफ़ला । ये एक ही हैं । जलजम्बु । नादेयी । को एक ही समझें ।
कणा । कृष्णा । उपकुंची । शौण्डी । मागधिका । पिप्पली से कहते हैं ।

सोमवार, जुलाई 19, 2010

हाजिर की हुज्जत गये ..?




लेखकीय-- कुछ दिनों से मेरे " बाराह " साफ़्टवेयर में प्राब्लम हो रही है । जिससे लेख के शब्दों में न चाहते हुये भी अशुद्धियां हो जाती हैं । जैसे चन्द्र बिंदी न लग पाना । अणा शब्द का न लिख पाना आदि । इस टेक्नीकल गलती को मद्देनजर रखते हुये पाठकों से उसी सहयोग की अपेक्षा है । धन्यबाद ।
एक आम धारणा है । कि अच्छे साधु संत आजकल कहां मिलते हैं । चारों तरफ़ पाखन्डियो की भरमार है ।
एक बात सोचे । क्या यही विचार कबीर के समय नही थे । रैदास को उस समय लोग जानते थे कि ये उच्च स्तर के संत हैं मीरा को परेशान करने में कोई कसर छोडी गयी ? तुलसी को लोगों ने कम परेशान किया ? ईसा मसीह को कितना परेशान किया ? मुहम्मद साहव का विरोध करने वाले नहीं थे क्या ? संत तबरेज की तो खाल खींच ली गयी थी । कबीर को बाबन बार मौत की सजा दी गयी । गौतम बुद्ध को कितने ही गाली देते थे । राम को तुम लोगो ने कम टेन्शन दी । कृष्ण को कम दुखी किया । किसी भी अच्छे संत का इतिहास उठा कर देखिये । वह आपको सुख शान्ति का मार्ग दिखा रहा था । आप उसको गालिया दे रहे थे । मार रहे थे । इसी को कहा गया है । हाजिर की हुज्जत गये की तलाशी । आप किसकी सेवा करते हैं । आप किसको आदर देते हैं । जो आपको ठगता है । आपको गलत मार्ग दिखाता है । वह आपको सही लगता है । आज कबीर रैदास मीरा ईसामसीह तुलसी मुहम्मद साहब तबरेज आदि की पूजा होती है । एक समय आप ही लोग हाथ धोकर इनके पीछे पड गये थे । ऐसा क्यों हुआ । आज जब ये हमारे बीच हैं नहीं । तब इनको पूजने इनकी महत्ता का क्या लाभ । एक समय जब ये आप को बिना किसी स्वार्थ के ग्यान का मार्ग दिखा रहे थे । आपको खुद आपकी आत्मा के उद्धार मुक्त हेतु सरल सहज उपाय बता रहे
थे । तब आप लाठी लेकर इनके पीछे दौड रहे थे । किसी संत ने आपका क्या ले लिया । जो आप मरने मारने पर आमादा हो जाते है । हिंदू मुसलमान या किसी भी धर्म के संत ने यदि आप गौर से उसकी बात को समझें । तो आपको नेकी का रास्ता । ग्यान का रास्ता । भक्ति का रास्ता स्थायी सुख का रास्ता ही दिखाया होगा । पर आप ने धर्म को तोता की तरह रट लिया है । उससे हटकर आप कुछ नहीं सुनना चाहते । उससे अलग आप को कुछ भी पसन्द नहीं । आप स्वयं ही ग्यानी है ? महाग्यानी ?
आप संत से ग्यान लेने नहीं उसकी परीक्षा करने जाते हैं । उसमें खोट निकालने जाते हैं । यह उसी तरह हुआ कि आप किसी शिक्षक से पडने जाओ और उल्टे उसका इंटरव्यू लेने लगो । आप नौकरी के लिये जाओ और एम्पलायर में मीन मेख निकालने लगो । क्या आपने कभी सोचा है । कि धार्मिक आध्यात्मिक रहस्य कितने गूढ हैं ? जिसका आप सतही स्तर पर । सतही ग्यान पर आकलन करते हैं । अगर आपने थोडे ही शास्त्रों का गम्भीरता से अध्ययन किया होता । तो आपकी तमाम सोच ही बदली हुयी होती ।
अगर धर्म गाली देने के लिये है । लोगों को अंधेरे में ले जाने के लिये है । तो आपने कभी गौर किया है । कि वाल्मीक रामायण ( संस्कृत ) तुलसी रामायण ( हिंदी ) कुरान ए पाक । बाइबिल । गुरु ग्रन्थ साहिब एक ही बार क्यों लिखी गयी । अगर इन्हें " मनुष्य " स्तर पर लिखा गया होता तो हजारों अन्य लेखकों ने और ग्रन्थ लिख डाले होते । दरअसल ये ईश्वरीय प्रेरणा से लिखी गयी । इसलिये इनकी दिव्यता इनकी अहमियत इतने समय के बाद भी ज्यों की त्यों है । इन्हें हरेक किसी के द्वारा लिखा जाना मुमकिन ही नहीं है । अगर आप ने धर्म का अध्ययन किया होता । तो आप को मालूम होता कि ग्यान सीखा नहीं जाता । बल्कि ग्यान पात्र के अनुसार उतरता है । बडे बडे किताब ग्यानी हंसी बनाते हैं कि तुलसी को पत्नी ने झिडक दिया तो रामायण ही लिख डाली । आज तो बहुत से पति स्त्रियों के हाथ पिटते हैं ।
कितनी रामायण लिख गयीं ? तो कहने का अर्थ ये है कि जिस तरह अच्छे बुरे इंसान प्रत्येक काल में मौजूद होते हैं । उसी तरह अच्छे बुरे संत भी होते हैं । पर आप बुरों को जल्दी देख लेते हैं । और फ़िर उसी नजर से सबको देखने लगते हैं । इसके बजाय बुद्धि विवेक से विचार करते हुये संत से ग्यान वार्ता करें । फ़िर अच्छा बुरा चयन करें । और आपको रुचिकर लगे । तो संत के बताये मार्ग पर चले । जरा देखिये रामायण क्या कह रही है । जो विरंचि शंकर सम होई । गुरु बिनु भव निधि तरे न कोई । श्रीकृष्ण ने कहा है । संत मिले तो मैं मिल जाऊं । संत न मोते न्यारे । संत बिना मैं ना मिल पाऊं । कोटि जतन करि डारो । और लोग कहते हैं कि परमात्मा तो सबके अन्दर है । उसके लिये गुरु की आवश्यकता क्या ?

शुक्रवार, जुलाई 16, 2010

हठ योगी

बबलू चालीस साल का हट्टा कट्टा युवक था । और स्वभाव से मिलनसार था । हाँलाकि उससे पहले भी बबलू से मेरी दुआ सलाम थी । लेकिन न तो बबलू जानता था कि मेरी कुन्डलिनी आदि ग्यान में रुचि है । और न ही मैं जानता था कि वो इस दिशा में पिछले सोलह साल से प्रयासरत है । लेकिन एक दिन मेरे एक परिचित यदुनाथ सिंह के साथ जब वो मेरे पास आया तो उस की निगाह एक प्रवचन के कार्यक्रम के दौरान लगाये गये बैनर पर गयी । जिसमें कुन्डलिनी के बारे में लिखा था । उसे भारी जिग्यासा हुयी और वह कुन्डलिनी के वारे में अनेकों प्रश्न करने लगा । मैंने उससे उसकी साधना
के वारे में बात की । कि वह क्या और किस तरह की साधना करता है ? बबलू अपने को " हठ योगी " मानता था । उसकी पत्नी और एक पाँच साल का लङका था । जिसे एक तरह से उसने त्याग रखा था ।यह बबलू का दुर्भाग्य ही था कि ग्यान जिग्यासा के प्रारम्भिक काल में वह बनाबटी बाबाओं के सम्पर्क में आया । और बाद में कोई परिणाम न मिलने पर हताश होकर अपने मन से एक नयी साधना बनाकर उसे हठ साधना कहने लगा । और खुद को " हठ योगी " घोषित कर दिया । मैंने पूछा । क्या है । तुम्हारा
हठ योग ? इस प्रश्न का उत्तर देने में वह बहुत देर तक सोचता रहा । फ़िर बोला । कि मैं अक्सर रात को एक तसले में धूनी आदि लगाकर सभी व्यवस्था करके । मन में हठ धारणा करके एक आसन लगाकर बैठ जाता हूँ । कि प्रभु जैसे तुमने भूतकाल में साधुओं का हठ माना है । मेरा भी मानोगे ?
मैंने मुस्कराते हुये पूछा । कि इस तरह का " हठ " धारण किये हुये तुम्हें कितने साल हो गये ? आठ साल । उसने उत्तर दिया । मैंने कहा । कुछ भी चींटी चींटा जैसा कोई छोटा बङा अनुभव हुआ ? उसने एक आह भरी ।
उसके चेहरे पर घोर निराशा जागी । फ़िर अपने आप को सहज करता हुआ बोला । टाइम लगता है । भाईजी । मैंने कहा । मान लो एक कार खङी हो । और चलने के लिये हर तरह से फ़िट हो । और आप उसके स्टेयरिंग पर बैठकर ये हठ करो । कि ये मेरे बैठने मात्र ही से चल जाय । तो क्या वह चल जायेगी ? आप उसमें चाबी मत लगाओ । उसके अन्य फ़ंक्शन स्टार्ट न करो । तो वह कैसे चलेगी ?
इसके बाद वह हठ योग पर एक लम्बी बहस करने लगा । कैसे अग्यान में जीते है । ये तमाम साधक ? मुझे अस्सी अस्सी साल के ऐसे साधकों से मिलने का अनुभव है । जिन्होंने अपने जीवन के पाँच से लेकर बारह साल तक का बेहद कीमती समय ऐसी ही अग्यानता में नष्ट कर दिया । कोई एक पैर पर खङा रहा । किसी ने हाथ ऊँचा उठा लिया । कोई जल में खङा रहा । कोई तपती धूप और गर्मी में आग के बीच में खुद को तपाता रहा । किसी ने अन्न त्याग दिया । कोई पत्ते ही खाने लगा । किसी ने केश न कटाने का संकल्प कर लिया । किसी ने लिंग की नसें तोङकर उसे निष्क्रिय करवा दिया । कोई वन में चला गया । कोई गुफ़ा में चला गया ..आदि । वास्तव में यह सब शास्त्रों में वर्णित पूर्व श्रेष्ठ उपासकों की एक मनमानी और मनमुखी नकल है । भूतकाल में जिन साधकों ने यह विधियाँ अपनायी थीं । उन्होंने पूर्ण ग्यान का सहारा लिया था । वे मन्त्र आदि उपचार और पूर्णत वैदिक ग्यान परम्परा का अनुसरण करते थे ।
नाकि आजकल के साधकों की तरह एक बात का हठ ले लेते थे । किसी विशेष आसन या मुद्रा में खङे रहना मन की थिरता ( स्थिरता ) के लिये था । शंकर जी और श्रीकृष्ण के भाई बलराम जी ने किसी भी योग साधना के लिये सबसे बङिया " सुखासन " को बताया है । यानी वो आसन जिसमें आप किसी भी प्रकार की तकलीफ़ न महसूस करें । चाहे वो पालती मारकर बैठने की मुद्रा हो या फ़िर शरीर की कोई भी मुद्रा । इसके पीछे वजह ये है । कि यदि आप किसी विशेष आसन से निरंतर कष्ट की अनुभूति करते हैं तो फ़िर साधना में आपका ध्यान नहीं लगेगा । लेकिन सुखासन का ते मतलब भी नहीं है । कि आप इतने सुख में हो कि साधना के स्थान पर आपको नींद आने लगे । हठ योग को कुछ साधु भगवान के प्रति एक पिता और पुत्र जैसा रिश्ता मानकर बालसुलभ हठ की धारणा लेकर चलते हैं । जिसका आशय ये होता है कि जिस प्रकार एक पिता बालक का हठ पूरा करता है । भगवान उनकी भी बात सुनेगा ।
अपनी इस बात को लेकर कालान्तर में हठ योग द्वारा सिद्ध कुछ उदाहरण भी उनके पास मौजूद होते हैं । ये लोग उन उदाहरणों में मौजूद रहस्य को नहीं समझ पाते और अपना जीवन बरबाद कर लेते हैं । वास्तव में इस तरह के जो भी हठ सिद्ध हुये हैं । उनमें अनजाने में एक शुद्ध और निर्मल पवित्र धारणा बन गयी । इस तरह सुरती एकाग्र होकर । आस वास दुबिधा सब खोई । सुरती एक कमल दल होई । वाली क्रिया अनजाने में सहज रूप से हो गयी । और यही करना है । द्रोपदी ने कौन सा हठ कौन सा योग किया था । ग्राह के चन्गुल में फ़ँसे गज ने कौन सा योग किया था । भूतकाल में हुयी सती और पतिवृता स्त्रियों ने कौन सा विशेष योग अपनाया था ? उन्होंने काल की गति तक बदल दी । सूर्य को निकलने से रोक दिया । निश्चित मृत्यु को जीवन में परिवर्तित कर दिया । केवल एक लगन । केवल एक धर्म । इससे अच्छा सरल और सहज योग क्या होगा । बहुत कम लोग जानते होंगे कि गौतम बुद्ध ने भी प्रारम्भ में एक तरह से हठ ही किया था । वन में वृक्ष के नीचे बैठ गये और सोचने लगे कि कैसे प्रभु की प्राप्ति हो । कैसे ग्यान की प्राप्ति हो । बहुत समय बीत गया । हताशा होने लगी । वन के कष्टों ने अत्यन्त व्याकुल कर दिया । तब अंतर्मन से सहज पुकार उठी । कि प्रभु बहुत कष्ट में हूँ । सुख शान्ति का मार्ग कैसे पाऊँ । जो क्रिया सालों में घटित नहीं हुयी । एक क्षण में घटित हो गयी । आकाशवाणी हुयी कि हे साधक अपने शरीर के माध्यम पर ध्यान कर । कोटि जन्म का पंथ था । पल में दिया मिलाय । क्या साधना से घटित हुआ । नहीं एकाग्र प्रार्थना से संभव हुआ । यही एकाग्र प्रार्थना सालों पहले कर लेते तो भी यही क्रिया घटित होती । पर तब " कर्तापन " का हठ था । ये उसी तरह है कि दो लोग कार की सवारी का आनन्द लेना चाहे । तो एक बैठे और दूसरा धक्का मारकर उसको गति दे । फ़िर सवार धक्का दे और धक्का मारने वाला सवारी करे । इसके बजाय आप तरीका जानते हैं तो आराम से सीट पर बैठे चाबी लगाकर स्टार्ट करें और आराम से सफ़र करें । क्या करना है । मैं मारना है । कर्तापन मारना है । अहम बाधक है । यही एकाग्र नहीं होने देता । यही नहीं मिलने देता । गौर करें ।
सुरति फ़ँसी संसार में तासो हुय गयो दूर । सुरति मान थिर करो आठों पहर हजूर ।
जब मैं था तब हरि नहीं । जब हरि हैं मैं नाहिं । सब अंधियारा मिट गया जब दीपक देख्या मांहि ।
प्रेम गली अति सांकरी । जामें दो न समाय । शीश उतार भूमि धरो तब पैठो घर माहिं ।
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा ।

गुरुवार, जुलाई 15, 2010

गुरुपूर्णिमा उत्सव पर आप सभी सादर आमन्त्रित हैं ।

गुर्रुब्रह्मा गुर्रुविष्णु गुर्रुदेव महेश्वरा ।
 गुरुः साक्षात पारब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।

श्री श्री 1008 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज " परमहँस "

अनन्तकोटि नायक पारब्रह्म परमात्मा की अनुपम अमृत कृपा से ग्राम - उवाली । पो - उरथान । बुझिया के पुल के पास । करहल । मैंनपुरी । में

सदगुरुपूर्णिमा उत्सव बङी धूमधाम से सम्पन्न होने जा रहा है । गुरुपूर्णिमा उत्सव का मुख्य उद्देश्य इस असार संसार में व्याकुल पीङित एवं अविधा

से ग्रसित श्रद्धालु भक्तों को ग्यान अमृत का पान कराया जायेगा ।
यह जीवात्मा सनातन काल से जनम मरण की चक्की में पिसता हुआ धक्के खा रहा है व जघन्य यातनाओं से त्रस्त एवं बैचेन है ।
जिसे उद्धार करने एवं अमृत पिलाकर सदगुरुदेव यातनाओं से अपनी कृपा से मुक्ति करा देते हैं ।

अतः ऐसे सुअवसर को न भूलें एवं अपनी आत्मा का उद्धार करें । सदगुरुदेव का कहना है । कि मनुष्य यदि पूरी तरह से ग्यान भक्ति के प्रति समर्पण हो । तो आत्मा को परमात्मा को जानने में सदगुरु की कृपा से पन्द्रह मिनट का समय लगता है । इसलिये ऐसे पुनीत अवसर का लाभ उठाकर आत्मा की अमरता प्राप्त करें ।

नोट-- यह आयोजन 25-07-2010 को उवाली ( करहल ) में होगा । जिसमें दो दिन पूर्व से ही दूर दूर से पधारने वाले संत आत्म ग्यान पर सतसंग करेंगे ।
विनीत -


राजीव कुलश्रेष्ठ । आगरा । पंकज अग्रवाल । मैंनपुरी । पंकज कुलश्रेष्ठ । आगरा । अजब सिंह परमार । जगनेर ( 


आगरा ) । राधारमण गौतम । आगरा । फ़ौरन सिंह । आगरा । रामप्रकाश राठौर । कुसुमाखेङा । भूरे बाबा उर्फ़ पागलानन्द बाबा । करहल । चेतनदास । न . जंगी मैंनपुरी । विजयदास । मैंनपुरी । बालकृष्ण श्रीवास्तव । आगरा । संजय कुलश्रेष्ठ । आगरा । रामसेवक कुलश्रेष्ठ । आगरा । चरन सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । उदयवीर सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । मुकेश यादव । उवाली । मैंनपुरी । रामवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । सत्यवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । कायम सिंह । रमेश चन्द्र । नेत्रपाल सिंह । अशोक कुमार । सरवीर सिंह ।

शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

कुछ और प्रश्न ?

लेखकीय-- ये आप लोगों के कुछ प्रश्न हैं । जो मुझे ई मेल से प्राप्त होते हैं । समयाभाव के कारण सभी के उत्तर देना सम्भव नहीं हो पाता । अतः महत्वपूर्ण प्रश्नों को छाँटकर उनका उत्तर देने की कोशिश कर रहा हूँ । अन्य पाठकों के उत्तर भी शीघ्र ही देने की कोशिश करूँगा । इस लेख में *(एक स्टार ) से आपके प्रश्न हैं । और ** ( दो स्टार ) से मेरे उत्तर हैं । यदि आपको मेरे उत्तर में कोई त्रुटि नजर आये । तो अवश्य सूचित करें । क्योंकि मैं ही ग्यानी हूँ । ऐसा मैं कभी नहीं सोचता । आपके सुझावों और प्रश्नों का हमेशा स्वागत है ।* Respected Rajeev ji,My name is Trayambak Upadhyay. I am from varanasi. I like your blog and would like to talk to you about " atma darshan." What should be a good time to reach you. I am free in weekend (Saturday & Sunday).With regards, Trayambak Upadhyay
** स्नेही उपाध्याय जी ! आत्म ग्यान पर आपकी जिग्यासा जानकर खुशी हुयी । आप किसी भी दिन सुबह
7.00 am to 10.00 am और दोपहर 3.00 pm to 7.00 pm के समय बात कर सकते हैं । मेरा फ़ोन न . और ई मेल लगभग सभी ब्लाग्स में प्रकाशित है ।
* आपने शायद ध्यान न दिया हो पर ओशो ने स्वृणिम बचपन में मग्गा बाबा, पागल बाबा और मस्तो तीन नामों का जिक्र किया है और कहा है कि Enlightenment को पहुँचने वाले किसी भी व्यक्ति को तीन enlightened व्यक्ति सहायता करने के लिये मिलते ही मिलते हैं। पर उनकी कई बातों की तरह यह बात भी एक parable हो सकती है। वे ऐसा कभी नहीं कहते कि उन्हे किसी गुरु की वजह से आत्मग्यान मिला।जे कृष्णमूर्ति भी किसी गुरु की बात नहीं करते। देखा जाये तो गुरुओं की संगत छोड़ने के बाद ही गौतम को बुद्धत्व मिला।
* * जानकारी देने के लिये धन्यवाद । ये तीन व्यक्ति ओशो ने प्रतीक रूप में कहे थे । पहला शिक्षक के रूप में । दूसरा गुरु के रूप में । तीसरा सतगुरु के रूप में । किसी किसी मामले में यह पहला माँ बाप के रूप में । दूसरा किसी भी माध्यम से द्वैत ग्यान के रूप में । तीसरा किसी माध्यम से आत्म ग्यान या अद्वैत के रूप में । मैं आपसे सहमत हूँ । विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरने पर भी ये तीन माध्यम हरेक की जिंदगी में आते हैं । यदि उसे सत्य की प्राप्ति हो तो ?
* मेने आपकी पोस्टों को अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिये एक बलोग बनाया है,
rajeev-swaroopdarshan.blogspot.com
** आपका बेहद धन्यवाद । जो आपने अपना कीमती समय प्रभुकार्य और प्रभुभक्ति में लगाना शुरू कर दिया । इसके सम्बन्ध में इतना ही कह सकता हूँ । " भक्ति स्वतन्त्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहि प्रानी ।" सच्चे दिल से प्रभु का कार्य करने पर मिलने वाले वेतन की कल्पना भी करना मुश्किल है । कि कितना ज्यादा हो सकता है ?
* एक बार आपका लेख पढने को मिला । और मैं आपका अनुसरणकर्ता हो गया ।क्योंकि यह लेख मेरी रूचि के हैं ।और मुझे पहली बार ही दुर्गास्तुती का पाठ करने पर माँ दुर्गा और माँ काली के साक्षात दर्शन हुये थे । और उस समय मेरे कोई गुरुजी नहीं थे । अधेंरा था । समय तो ज्ञात नहीं । परन्तु में माँ काली के स्वरूप से डर गया था । और माँ दुर्गा के संकेत था । क्या चाहिये ? मैंने कहा कुछ नहीं । और दोनो अन्तर्ध्यान हो गयीं । उसके बाद बहुत प्रयत्न वही दर्शन पाने के लिये करा । पर कभी दर्शन नहीं हुये । समझ में नहीं आता क्या करूं ?
* * भले ही आप को लगता है । कि आप इस जीवन के बारे में ही जानते हैं । पर सत्य यह है । कि भगवत प्राप्ति के जीव के प्रयास करोङों जीवन से जारी हैं । जिसे आपका अचेतन बखूबी जानता है । ऐसे ही किसी प्रयास की डोर अनजाने में प्रभु से जुङ जाती है । तब ऐसी घटना हो जाती है । बाद में उसी चीज को आप " कर्ता " बनकर करने की कोशिश करते हैं । जो सफ़ल नहीं होती । इस सम्बन्ध में कबीर साहिब ने लिखा है । " जब मैं था तब हरि नहीं । जब हरि हैं मैं नाहिं । सब अंधियारा मिट गया । जब दीपक देखा माँहि । इसके अतिरिक्त भी जीव जब रोज आने वाली लगभग " आधा घन्टे " की गहरी नींद में जाता है । वह प्रभु के पास ही जाता है । पर क्योंकि प्रभु विधान के अनुसार उसे बक्से में बन्द करके ले जाया जाता है । इसलिये वह इस सत्य को नहीं जान पाता । इसी को " तुरीयातीत अवस्था " कहते हैं ।
ग्यान के पहले अध्याय में " यहीं पर जागना " सिखाया जाता है । तब आपको " अलौकिक " अनुभव होते हैं ।
* मैंने परमहंस योगानन्द जी को गुरू बनाया था । उनके अध्याय आते थे । एक महिने में एक बार । उन अध्यायो का भी बहुत प्रभाव पड़ा था । वो अध्याय भगवत प्राप्ति के नहीं थे । हाँ उन अध्यायों की प्रेरणा से में दोनो भोहों के मध्य चक्र से third eye से लोगों के रोगों का निवारण कर लेता था । इसी बीच में मेने एक गुरू बनाये थे । पर गुरुमन्त्र नहीं मिला था । वो कालभैरव का रविवार को दरबार लगाते थे । और मंगलवार को हनुमान जी पर चोला चड़ाते थे ।
** जिनका जिक्र आपने किया । जहाँ तक मेरी जानकारी है । ये " त्राटक और " ॐ " को लेकर चलते हैं । जो कि " आत्मग्यान " नहीं है । भक्ति भी नहीं है । हाँ योग अवश्य है । और कोई विशेष महत्वपूर्ण नहीं है । कालभैरव और हनुमान की मिश्रित साधना को संकेत में समझें । ये तामसिक साधनायें हैं । जिनका अंत किसी भी रूप में इनसे जुङने वाले के लिये दुखदाई ही होता है । आपको एक रहस्य की बात बता दूँ । सभी सिद्धियाँ जीवन में तो यश और वैभव दे देती हैं । पर अंत में " नरक " में ले जाती हैं । इसमें कोई संशय नहीं है । निर्मल भक्ति ही सब प्रकार से श्रेष्ठ कही गयी है । " निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा । "
* मेने एक विदेशी विद्या सीखी थी । प्राणिक हीलिंग । उस विद्या के द्वारा घर बैठे कितनी भी दूर कोई हो । उसके रोगों का इलाज कर लेता था ? और सामने बैठे तथा अपना भी इलाज कर लेता था । एक बात और । मेरा ध्यान माँ भगवती के चरणो में कभी भी । स्वंय लग जाता था ?
** यह कोई बङी बात नहीं । कुंडलिनी साधना में इस प्रकार की लाखों चीजें हैं । पर इनका पैसे और प्रतिष्ठा के लिये उपयोग नहीं करना चाहिये ।(जैसा कि कुछ लोग करते हैं ) ये खुद को खुद ही फ़ाँसी पर लटकाने के समान है । अभ्यास से ध्यान की अनुभूति भी हो ही जाती है ।
* एक बार मेने भेरो और हनुमान जी के साधक से कोई प्रश्न पूछा । तो उन्होने मुझे बुरे प्रकार से डाट दिया । मुझे चार दिन नींद नहीं आयी । और मेरे को जो कुछ भी प्राप्त हुआ था । सब समाप्त हो गया । योगानन्द जी के अध्यायों पर आधारित पहली परिक्षा उत्तीर्ण भी कर ली थी । और दूसरी परिक्षा की तैयारी चल ही रही थी । और वो भी उत्तीर्ण कर लेता । तो योगानन्द जी के क्रियायोग मुझे सिखाया जाता । इस हादसे के बाद में । योगानन्द जी के बाकी के अध्याय पड़ने में रूचि समाप्त हो गयी । प्रयत्न करके भी नहीं पड़ पा रहा हूँ । क्या इनको प्राप्त करने में,आप मेरी सहायता कर सकते हैं ?
** साधु जीवन धारण करने का वास्तविक अर्थ ही जीवों को प्राप्त ग्यान के अनुसार चेताना या सहायता करना है । मैं हरेक की " अध्यात्म ग्यान " में जितना जानता हूँ । उसके अनुसार सहायता करने की भरपूर कोशिश करता हूँ । यह जीव का अपना भाग्य और लगन है कि उसे कितना प्राप्त होता है ? असली साधु कभी जिग्यासु को डाँटते या उपेक्षित नहीं करते । आप निर्भय हो जाईये ।
* और आपको मेरे लिये " हंस " ग्यान पर लिखने के लिये हार्दिक धन्यवाद ।
* आपका "जय गुरूदेव की" और "जय जय श्री गुरूदेव" के बारे में ज्ञान देने के लिये धन्यवाद ।
* एक जिज्ञासा मन में है,बहुत से लोग "जय श्री राम", " जय श्री कृष्ण", "जय जय श्री राधे", "जय माता की " इत्यादि का अभीवादन के रूप में प्रयोग करतें हैं । उसका क्या प्रयोजन है ?
** यह प्रथ्वीलोक या मृत्युलोक " त्रिलोकी सत्ता " के अन्तर्गत आता है । जिसका अधिपति राम या कृष्ण ( एक ही बात है ) और उसकी पत्नी राधा या सीता के हाथों में है । सरल भाषा में यह यहाँ के राजा रानी है । और राजा रानी की जय जयकार करना पुरातन परम्परा रही है । इतिहास की जानकारी रखने वाले जानते है । अतीत में कई राजाओं की भगवान के समान पूजा हुयी है । शास्त्रों ने भी भू अधिपति को भगवान के तुल्य बताया है । इस तरह से यह एक प्राचीन परम्परा के रूप में चली आ रही है । मैं जिस स्थान पर रहता हूँ । यहाँ " जय भोले की " कहने का रिवाज है । मैंने बहुत से दलित वर्ग को " जय भीम "( डा. अम्बेडकर ) कहते सुना है । राम का वास्तविक अर्थ " रमता " कृष्ण का " आकर्षण । और राधा का " प्रकृति " है । जैसे बालक अवस्था में हमें सर्वप्रथम माँ बाप प्यारे होते हैं । क्योंकि उनके अतिरिक्त हम अन्य को नहीं जानते । उसी प्रकार प्रकृति ( राधा ) और पुरुष ( राम ) ये माँ बाप जैसे लगते हैं । ये जीव भाव है । आत्मा क्योंकि जीव भाव से परे है । अतः वहाँ मामला दूसरा है । जिसको आसानी से समझना और समझाना दोनों ही कठिन है ।
* मेने कबीर दास जी का दोहा पड़ा है ।
" गुरू गोविन्द दौऊ खड़े काके लागुं पांय । "" बलिहारी गुरू आपने जिन गोविन्द दियो बताय । "
इस दोहे के अनुसार मुझे लगता है । प्रारम्भ तो गुरू जी से ही किया जाता है । और जब भगवत प्राप्ति हो जाती है । तो उक्त अभिवादन प्रयोग किये जाते हैं । कृपया इस पर प्रकाश डालियेगा ?
** इसका उत्तर इतना सरल तो नहीं है ।और गुप्त है ? फ़िर भी रामायण की चौपाई से संकेत कर रहा हूँ । शायद आप समझ जाओ । " जेहि जानहि जाहे देयु जनाई । जानत तुमहि तुमहि हुय जाई । "
राम कृष्ण से कौन बङ । तिनहू ने गुरु कीन । तीन लोक के ये धनी गुरु आग्या आधीन ।
और ऊ यती तपी संयासी । ये सब गुरु के परम उपासी ।
वास्तव में रामायण आदि ग्रन्थों में लिखा है । कि गुरु महिमा या संत महिमा का वर्णन ब्रह्मा विष्णु महेश सरस्वती और अपने हजारों मुखों के साथ शेष जी भी नहीं कर सकते । एक साल धैर्य रखें । मेरी बतायी साधना करें । आपके बहुत से प्रश्नों के उत्तर आपको स्वयं ही मिलेंगे ?

ब्लागर अनूप जोशी के कुछ और प्रश्न

dhnyabad sir mujhe itna time dene ke liye. bus sir ab ye to turk hai. me aapke sabhi utaaro ka fir se jabab de sakta hun. lekin us chij se sirf bahas hogi or kuch nahi.mera gyan adhyatam me bahut kam hai.fir bhi kuch sawal puch rahan hun:-सर कृपा कर के इनके जबाब साधारण भाषा में एक छोटी सी लाइन में दे । तो में दूसरो को समझा सकू । उधारण के तौर में में अगर बिज्ञान से कहूँ कि पानी क्या है । तो जबाब आएगा H20,या hyadrogen और oxigen का मिशिरण । लेकिन सर आपकी में बहुत इज्जत करता हूँ । आपकी हर पोस्ट पढता हूँ । अब अगर कोई इंसान कुछ जानना चाह रहा है । तो उसमे किसी को क्रोध नहीं आना चाहिये । क्या कहते है सर ?उत्तर-- अनूप जी आपके इसी प्रश्न के प्रतिप्रश्न में सारे सवालो का जबाब है । आप यदि एक अनपढ व्यक्ति से कहें कि पानी...। @ मैं आपसे पूछता हूँ । ये h2o क्या है । ये oxigen क्या है । तो आपको उसे समझाने हेतु थ्योरी और प्रक्टीकल आदि तमाम चीजें बतानी होंगी । फ़िर भी पानी बन जाने के बाद मूल प्रश्न ज्यों का त्यों रहेगा । आखिर इन दोनों मिश्रण से " पानी " बन कैसे जाता है ? जिस प्रकार आप इस फ़ार्मूले को ( अगर जानकार हैं तभी ) सिद्ध कर सकते हैं । कोई भी आत्म ग्यानी " आत्मा " को जानने का सरल मार्ग आपको बता सकता है । जिस प्रकार भौतिक चीजों का बिग्यान है । आत्मा का भी बिग्यान है । पर आप उसको अध्ययन करोगे तभी तो जान पाओगे ? क्रोध को खत्म करना साधु का पहला अध्याय है ।
१) विदेश में अवतार लेने वाले कुछ भगवान के नाम बता दीजिये ।उत्तर-- अवतार के बारे में संक्षेप में बताना कठिन है । अवतार आधा होता है । आपको लगता होगा कि राम कृष्ण आदि ही अवतार हुये थे । ईसा मसीह । बुद्ध । आल्हा ऊदल ( पांडवों के अवतार ) आदि हजारों छोटे अवतार भी हुये हैं । जिनमें मुझे अपने देश के अवतार भी ठीक से नहीं मालूम । सभी अवतारों का विवरण " हरिवंश पुराण " में दर्ज होता है । जिसमें होने वाला " कल्कि अवतार " भी पहले से लिखा है ।
विदेश में -- मुझे अभी जो ई मेल मिलते हैं । उनमें लिखे विदेशी नाम क्योंकि मुझे अटपटे लगते हैं । अतः एक घन्टे भी याद नहीं रहते तो फ़िर हजारों बरस पूर्व हुये विदेश अवतार कैसे याद रहेंगे ।
दूसरी महत्वपूर्ण बात-- लगभग दस हजार साल के अन्दर ही प्रथ्वी की भौगोलिक सरंचना । स्थानों के नाम
और संस्कृति में भारी बदलाब हो जाता है । इतिहास में झूठ की भरमार हो जाती है । मैंने प्रक्टीकल उपासना " ही की है । थ्योरी से मेरा वास्ता प्रसंगवश या जरूरत के अनुसार ही रहा है । ( फ़िर भी मैं सही नाम और स्थान मिलते ही आपको और पाठकों को अवश्य ही बताऊँगा । यदि कोई विदेश की जानकारी रखने वाला पाठक जानता हो तो कृपया अनूप जी को बताये । )
२) आपके अनुसार आत्मा एक योनी से दूसरी योनी में जाती है तो क्या जब सृस्ठी कि रचना शास्त्रो अनुसार ब्रह्मा ने कि होगी तो. बजाय कुछ जीव बनाने के इतने खरबों में जीव बनाये होंगे ? और अगर इतने जीव बना दिए तो उनको प्रजनन छमता क्यों दी ?उत्तर-- आत्मा कर्मों के अनुसार अन्य योनिंयो में ( मनुष्य छोङकर ) जाती है । सृष्टि आध्याशक्ति , ब्रह्मा , विष्णु , शंकर ने कृमशः अंडज ( अंडे से ) पिंडज ( शरीर से ) ऊष्मज ( जल आदि से ) और स्थावर ( वृक्ष , पहाङ आदि ) मिलकर बनाई । आध्याशक्ति इन तीनों की माँ थी । जिसका सीता के रूप में अवतार हुआ था । अगर सृष्टि में नर मादा और काम आकर्षण या प्रजनन आदि खेल न होते तो फ़िर क्या होता ? सब खेल ही तो है । जिसमें मोह का परदा है ।
३)भगवान् ने द्वापर । या सतयुग में ही अवतार लिया । अब जबकि कई रावण और कंस से भी कई गुना ज्यादा पापी यहाँ है तो अभी क्यों नहीं ।उत्तर -- लगभग प्रत्येक युग में अवतार होता है । आप अभी के राक्षस प्रवृति के लोगों की तुलना रावण आदि से कर रहे हैं । इनकी हैसियत उनके सामने मच्छर के बराबर भी नहीं है । वर्तमान में मलेच्छ प्रवृति के लोग बङेंगे । जब अधर्म अपनी सीमाओं को तोङ देगा । तब " कल्कि अवतार " होगा । जो
कुछ ही समय में होने वाला है । इस तरह के स्पष्ट रहस्य आप जानना चाहते हैं । तो एक सरल मन्त्र में आपको बता दूँगा । जिसके बाद आप खुद जान जायेंगे । बाकी इस तरह के रहस्य खोले नहीं जाते ।
४)अन्य धर्म वाले जो हमारे धर्म को नहीं मानते । और हम से कही गुना ज्यादा है ।वो भी क्या अज्ञानी है ? और अगर भगवान के रूप अनेक है । तो क्या आप भगवान के उन रूपों कि आराधना करते हो ?उत्तर-- सनातन धर्म एक ही है । जैसे मनुष्य के रूप में सब एक ही हैं । सिर्फ़ भाषा का अंतर होता है । जैसे , बिल्ली , केट ,बिलाब..अगर आप खोजें तो एक ही चीज के अलग अलग भाषाओं के अनुसार हजारों नाम हैं । भगवान as a मन्त्रालय । जो परमात्मा की सृष्टि का मन्त्रालय या संचालन करते हैं । ये सिर्फ़ अपने लोक के मालिक @ अथार्टी होते हैं । अगर आप ईसाई सिख उर्दू धर्म शास्त्र का अध्ययन करें । तो उसमें भी वही बात है । जो हिंदू धर्म ग्रन्थों में । मनुष्य को जो अच्छा लगता है । वह उसी को प्राप्त करता है । मैं " अद्वैत " मत का हूँ । जिसमें एक ही सर्वत्र है । दूसरा नहीं ।
५) मुझे जो कुछ अध्यातम लोगो ने बताया है कि अपनी योनी में अच्छे कर्म करने वाला आदमी कि योनी पाता है तो फिर यहाँ कुछ गरीब । कुछ अमिर । कुछ स्वस्थ । कुछ अपंग। कैसे हो जाते है ? और अगर ये पुराने जन्म का पाप है तो वो आदमी क्यों बना । कीड़ा क्यों नहीं ?उत्तर-- मनुष्य का जन्म दुबारा से चौरासी लाख योनियों को । जो साढे बारह लाख साल में पूरी होती है । को भोगने के बाद प्राप्त होता है ।शीघ्र ही दुबारा मानव जन्म अच्छे कर्मों से नहीं ग्यान से प्राप्त होता है । लाखों लोगों के करोंङो जन्मों के अलग अलग संस्कार होते हैं । उसी के अनुसार जीवन और स्वस्थ रोगी अमीर गरीब आदि स्थिति प्राप्त होती है ।
७) बाकी सर । मेने बिज्ञान हर चीज को सिद्ध करता है ये कहा था । बिज्ञान कोई चीज परदे में नहीं करता । सामने करता है । तो हम तो अज्ञानी है । अब हम तो कुण्डलनी शक्ति या महामंत्र नहीं ले सकते । एक अज्ञानी को इतना बता दे कि साधारण एक लाइन में हम कोई भी भगवान कि सिधता को कैसे देख सकते है ?
उत्तर-- ये सूर्य चन्दा अनोखी प्रकृति विविधिता भरा रंग बिरंगा जीवन बिग्यान की बदौलत है । या भगवान की बदौलत ? आप खुली आँखो से भगवान का विग्यान देखें । और फ़िर मनुष्य का बिग्यान । उसका बिग्यान कितना स्वचालित और परफ़ेक्ट है । अगर आप में पूरी लगन है । तो भगवान के दर्शन बतायी विधि से तीन महीने में हो जाते हैं । दिव्य नेत्र के द्वारा । " महामंत्र " जैसे नाम से न घबरायें ये सरल सहजयोग है ।

रविवार, जून 27, 2010

अनहद में दस तरह के शब्द ..?

सहज योग में दस तरह के शब्द सुनाई देते हैं । ये शब्द हमारे घट में हर समय हो रहें हैं । जरूरत इन को अभ्यास के द्वारा सुनने की है । ये शब्द सुन लेने का अर्थ मामूली नहीं है । यह योग की ऊँची स्थिति है ।
पहला शब्द " चिङियों की बोली " है । इस शब्द को सुनने से शरीर के सारे रोम खङे हो जाते हैं । ऐसा प्रतीत होता है । कि हरे भरे बाग में रंग बिरंगे फ़ूलों से लदे पेङ फ़लों से लदे पङे हैं । वहाँ चिङिया चहचहा रही हैं । यह शब्द सहस्त्रदल कमल के नीचे से सुनाई देता है ।
दूसरा शब्द " झींगुर की झंकार " जैसा है । इसको सुनने से शरीर में एक विचित्र तरह का आलस्य और सुस्ती पैदा हो जाती है ।
तीसरा शब्द " घन्टा घङियाल की आवाज " है । इस शब्द के सुनने से दिल में भक्ति और प्रेम बङता है । अभ्यासी को ऐसा महसूस होता है । कि किसी मन्दिर के अन्दर कोई विशाल घन्टा बज रहा हो । यह शब्द सहस्त्रदल कमल से सुनाई देता है ।
चौथा शब्द " शंख का शब्द है । इसके सुनने से मष्तिष्क से सुगन्ध आती है । और नशे के कारण आनन्द में सिर घूमने लगता है । ऐसा महसूस होता है । कि लक्ष्मी नारायण मन्दिर में शंख बज रहा हो । यह शब्द भी सहस्त्रदल कमल से सुनाई देता है ।
पाँचवा शब्द " वीणा और सितार की आवाज " है । इस शब्द के सुनने से " अमृतरस " मष्तिष्क से नीचे उतरता है । और बहुत आनन्द आता है । यह शब्द गगन मण्डल अथवा त्रिकुटी से सुनाई देता है ।
छठवाँ शब्द " ताल की आवाज " है । इस शब्द के सुनने से अमृत मष्तिष्क से हलक में नीचे गिरता है । यह शब्द दसवें द्वार से सुनाई देता है ।
सातवाँ शब्द " बाँसुरी की आवाज " है । इस शब्द को सुनने वाला अन्तर्यामी हो जाता है । और छिपे हुये भेदों को जान लेता है । जिससे उसको सिद्धि प्राप्त हो जाती है । यही वो बाँसुरी है । जो भगवान कृष्ण बजाते थे । यह शब्द भी दसवें द्वार से सुनाई देता है ।
आँठवा " मृदंग और पखावज का शब्द " है । इसको सुनने से अभ्यासी गुप्त वस्तु को देखता है । सुनने वाला हर समय शब्द में मग्न रहता है । क्योंकि यह शब्द बाहर भीतर निरंतर सुनाई पङता है । इससे दिव्य दृष्टि हो जाती है । यह शब्द सतलोक की सीमा भंवर गुफ़ा से सुनाई देता है ।
नौंवा शब्द " नफ़ीरी की आवाज " है । इस आवाज को सुनने से वह शक्ति मिलती है । जो देवताओं को प्राप्त है । इस शब्द को सुनने से शरीर हल्का और सूक्ष्म हो जाता है । और अभ्यासी साधक पक्षी के समान जहाँ चाहे वहाँ उङकर जा सकता है । और लोगों की दृष्टि से ओझल हो सकता है । वह तो सबको देख सकता है । परन्तु उसे कोई नहीं देख सकता । अर्थात उसकी दृष्टि पर जो पर्दा पङा था । वह उठ जाता है । यह संतो की गति है । जो बहुत मुश्किल से मिलती है । यह शब्द सतलोक से सुनाई देता है ।
दसवाँ शब्द " बादल की गरज " है । यही अनहद शब्द है । इसके सुनने से अच्छे बुरे सभी विचारों का नाश हो जाता है । अभ्यासी सिद्धि शक्ति और चमत्कार को बच्चों का खेल समझता है । क्योंकि सुनने वाला अपने वास्तविक स्वरूप से मिल जाता है । यह शब्द सतलोक से सुनाई देता है ।
यह दस प्रकार के शब्द हर समय अनहद में महसूस होते हैं । चित्त में भांति भांति के संकल्पों के कारण ये शब्द सुनाई नहीं देते । ये विना " गुरुकृपा " के सुनाई नहीं देते । इन आवाजों को सुनने में अन्तर हो सकता है । अर्थात कोई आवाज पहले या बाद में सुनाई दे सकती है । परन्तु इस पर ध्यान न दें और इसका कोई विचार न करें । और बांये कान से जो आवाज सुनाई दे उस पर तो बिलकुल ध्यान न दें । और " ज्योति स्थान " जहाँ पर सिद्धि की प्राप्ति होती है । वहाँ से साबधानी पूर्वक बचकर निकल जाना चाहिये । फ़िर मंजिल आसान है।
विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

मन और शरीर के दस वायु..

हमारे शरीर में दस प्रकार की वायु होती है । जिनमें पाँच प्रमुख होती हैं ।
1--प्राण वायु--इसका कार्य स्वांस को गति देना है । इसका स्थान दिल है । इसका देवता सूर्य है ।
इसकी गति बारह अंगुल बाहर तक है ।इसका स्वभाव गर्म है । और इसका स्वरूप लाल है ।
2--अपान वायु--इसका कार्य मल त्याग करना है । इसका स्थान गुदा है ।इसका देवता गणपति है ।
इसकी गति बाहर से अन्दर है । इसका स्वभाव ठंडा है । और इसका स्वरूप शीतल है ।
3--समान वायु--इसका कार्य शरीर में रस पहुँचाना है । इसका स्थान नाभि है । इसका देवता सम्पति है ।
4--उदान वायु--इसके द्वारा ब्रह्मकुन्ड से अमृत प्राप्त करके । समान वायु तक पहुँचाता है ।इसका स्थान गले से चोटी तक है । और इसका देवता इन्द्र है ।
5--व्यान वायु--इसका काम रस को निर्मल करके पहुँचाना और हरकत करना है ।पूरा शरीर इसका स्थान है ।और दिग्पाल इसका देवता है ।
6--करकल वायु--इसका काम भोजन को हजम करना है ।शरीर में इसका स्थान पेट है । और इसका देवता मन्द या जठराग्नि होता है ।
7--कूरम वायु--इसके द्वारा आँख की पलकें खुलती और बन्द होती हैं । शरीर में इसका स्थान आँख है। और इसका देवता ज्योति अथवा प्रकाश है ।
8---नाग वायु--इसका कार्य डकार लाना है । इसका स्थान गला है । तथा इसका देवता शेष है ।
9---देवदत्त वायु--इसके द्वारा जम्हाई आती है । स्तन में दूध पैदा होता है । शरीर में इसका स्थान छाती के नीचे है । और इसका देवता कामदेव है ।
10---धनंजय वायु--मृत्यु के पश्चात शरीर को फ़ुलाना इसका कार्य है । और शरीर की शोभा आदि इसके अन्य कार्य है ।
इस प्रकार ये दस वायु होते हैं । जिनके बारे में संक्षेप में लिखा गया है । आईये थोङा सा मन के बारे में भी जानें । मन इस शरीर का राजा और सामान्य जीव अवस्था में नियंत्रणकर्ता है । यह अष्टदल कमल पर चक्कर काटता रहता है । और विषय विकारों में फ़ँसा होने के कारण एकाग्र नहीं होता । विकारों में प्रवृति होने के कारण यह जीव को भक्ति मार्ग की और मुङने नहीं देता । और नाना प्रकार के पाप कर्मों में उलझाये रखता है । अष्टदल कमल की जिस पत्ती पर ये होता है । जीव को उसी के अनुसार कर्म में प्रवृत्त करता है । अष्टदल कमल की ये आठ पत्तिंया कृमशः1- काम 2- क्रोध 3- लोभ 4-मोह 5- मद (घमंड ) 6-मत्सर (जलन) 7-ग्यान 8- वैराग हैं ।
मन की शेप लगभग इतनी बङी o बिंदी जैसी होती है । इसमें मन , बुद्धि , चित्त , अहम चार छिद्र होते हैं । जिनसे हम संसार को जानते और कार्य करते हैं । मन शब्द प्रचलन में अवश्य है । पर इसका वास्तविक नाम " अंतकरण " है । ये चारों छिद्र कुन्डलिनी क्रिया द्वारा जब एक हो जाते हैं तब उसको सुरती कहते है । इसी " एकीकरण " द्वारा प्रभु को जाना जा सकता है । अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं हैं । मन को बिना चीर फ़ाङ के ध्यान अवस्था में देखा जा सकता है । नियन्त्रित किया जा सकता है । इसका स्थान भोंहों के मध्य एक डेढ इंच पीछे है । जीवात्मा का वास इससे " एक इंच " दूर बांयी तरफ़ है ।
हमारे शरीर के अंदर पाँच तत्वों की पच्चीस प्रकृतियाँ ( एक तत्व की पाँच ) हैं । तो 25 प्रकृति + 5 ग्यानेन्द्रिया + 5 कर्मेंन्द्रियां + 5 तत्वों के शरीर का नियंत्रणकर्ता और राजा मन है । इसी आधार पर 40 kg weight को एक मन कहने का रिवाज हुआ था ।

ब्रह्माण्डी चक्रों को जानें ..?

पिंडी चक्रों का वर्णन आप पूर्व में पढ ही चुके हैं । इससे आगे के क्रम में " ब्रह्माण्डी चक्रों " के बारे में बात करते हैं । इसमें त्रिकुटि दसंवा द्वार आदि से ऊपर की ओर आगे बङते हैं ।
1--त्रिकुटि--- यह तीन दल का कमल है । यहाँ ॐ का निवास है । यह त्रिकुटि संतो के लिये है । योगेश्वरों के लिये नहीं है । इसको हँसमुखी भी कहते हैं । वास्तव में यह सब ग्यान सच्चे संत और सदगुरु की कृपा
से ही संभव है । अन्यथा ये किताबी ग्यान से अधिक नहीं है । कोई भी संत तीन महीने से लेकर एक साल तक आपको ऐसे अनुभवों से रूबरू कराता है । तो वह सच्चा संत है । वरना पाखंडियों की संसार में भरमार है । यहाँ ये भी महत्वपूर्ण है । कि आप गुरु की बतायी बात पर अमल कितना कर रहे हैं ?
2--सुन्न या दसवाँ द्वार--- यह एक दल का कमल है। यहाँ पारब्रह्मा का निवास है । जिसे सर्व साधारण लोग कुल मालिक आदि करके मानते हैं । यहीं से मृत्य उपरान्त आत्मा यदि निकले तो मनुष्य फ़िर से मनुष्य जन्म का अधिकारी हो जाता है । इस द्वार को सहज योग द्वारा कुछ ही समय में देखा और जाना जा सकता है । शर्त वही पुरानी है । यदि आपका गुरु सिर्फ़ बातूनी ही नहीं है । बल्कि यहाँ तक पहुँचने का मार्ग युक्ति आदि जानता है । यह इस पर निर्भर है । इसलिये गुरु के चयन में विशेष खोजबीन की आवश्यकता होती है ।
कहा भी है " पानी पियो छान के । गुरु करो जान के । "
3-- महासुन्न-- यहाँ अन्धेरा मैदान है । यहाँ से " चार शब्द " तथा पाँच स्थान अति गुप्त है । जिनका पता कोई भेदी । कोई पहुँचा हुआ संत । अथवा सतगुरु की कृपा से ही लगता है । यह मनुष्य जीवन बेहद अनमोल है । और लाखों साल भटकने और अनेक कष्टों के बाद प्राप्त हुआ है । इसे यूँ ही वासनाओं के मकङजाल में फ़ँसकर व्यर्थ न जाने दें ।
4--भंवर गुफ़ा--- यहाँ " सोहं " पुरुष का निवास है । यह दो स्थान यानी " महासुन्न " और " भंवर गुफ़ा "
दयाल देश की सीमा में हैं ।
5--सतलोक-- यहाँ " सतपुरुष " का निवास है । इसके ऊपर तीन स्थान और भी हैं । जिन्हें संतो ने गुप्त रखा है । जीव यहाँ तक जान ले । वही बहुत बङी बात है । और यह सीना ब सीना ग्यान है । अधिक और स्पष्ट सच्चे संतो की सेवा में जाने से उनकी कृपा से प्राप्त होता है ।
आईये पिंड देश में सहस्त्र दल कमल के नीचे के छह स्थान जिनको षटचक्र भी कहते हैं । पिंड में उनके प्रतिबिम्ब हैं । आईये उनके कुछ और कार्यों के बारे में जानते हैं ।
1--पहला चक्र--दोनों आँखों के पीछे है । जहाँ सुरति अथवा रूह का ठहराव है ।
2--दूसरा चक्र--कंठ अर्थात गले में है । इस स्थान से स्वप्न की रचना होती है । जिसे जीवात्मा लिंग शरीर की सहायता से करता है । देह के प्राण का स्थान यहीं है ।
3---तीसराचक्र-- ह्रदय में है । दिल अर्थात पिंडी मन का यही स्थान है । संकल्प विकल्प यहीं से शुरु होते हैं । सुख -दुख ,आशा-निराशा , भय-निर्भय इत्यादि का प्रभाव इसी स्थान पर होता है ।
4--चौथा चक्र-- नाभि कमल में है । और स्थूल पवन का भन्डार है ।
5--पाँचवा चक्र-- इन्द्रिय चक्र है । स्थूल शरीर की उत्पत्ति यहीं से होती है ।
6---छठा चक्र--गुदा चक्र है । नाभि की और से प्राणों को खींचकर नीचे के शरीर अर्थात पैरों और टांगो को शक्ति देता है।
विशेष--मन , इन्द्रियाँ ,शरीर , सांसारिक पदार्थ और स्वर्ग आदि जङ हैं । परन्तु सुर्ति चेतन रूप है । त्रिकुटि स्थान में इसका मिलाप शुरु होता है । इसी स्थान तक माया का प्रभाव है । इसी स्थान से जङ चेतन की गांठ शुरु हुयी अर्थात बंधी है । सुर्ति के इस स्थान को जिनसे होकर वह नीचे उतरी है । उन्ही स्थानों से श्रेणी के हिसाब से ऊपर ले जाते हैं । अभ्यास के द्वारा उसे ऊपर की ओर खींचकर ले जाने से त्रिकुटी में जङ चेतन की गांठ खुल जायेगी । अर्थात जङ पदार्थ यहीं तक रह जाते हैं । आगे नहीं जा सकते । ब्रह्माण्ड के स्थान अत्यन्त बङे बङे और काफ़ी दूरी पर स्थित हैं । तथापि वायरलैस के समान उनकी डोरियाँ हमारे अंतर में लगी हुयी हैं । जब " सुरती शब्द योग " अभ्यास करने से " रूह " हमारे शरीर से सिमटकर ऊपर के स्थानों पर चङ जायेगी । तो जब और जितनी देर तक चङेगी । इन स्थानों पर तार लगा हुआ है । और वहाँ से जो धारायें आती हैं । वे दूरबीन के समान हैं । जिनके द्वारा हम अति दूरवर्ती स्थानों को आराम से देख सकते हैं । इसी तरह आँख के स्थान से समस्त बाहर की रचना के साथ
सूर्य चन्द्रमा तारों के समान जो बङे बङे स्थान हैं । उनसे किरणो की डोरियाँ लगी हुयी हैं । जिन्हें आराम से देख सकते हैं ।
वास्तव में " सहज योग " या सुरती शब्द योग अत्यन्त सरल है । यदि आपको प्रभु कृपा से कोई पहुँचे हुये संत की कृपा प्राप्त हो जाय तो । अन्यथा और ऊपर लिखी बातें आपके लिये " परी कथा " से अधिक नहीं हैं ।
विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता
है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।
जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । निज अनुभव तोहे कहूँ खगेशा । बिनु हरि भजन न मिटे कलेशा ।
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